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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  2.23.62 
‘सम्भोग’ - ‘विप्रलम्भ’ - भेदे द्विविध शृङ्गार ।
सम्भोगेर अनन्त अङ्ग, नाहि अन्त तार ॥62॥
 
 
अनुवाद
"दाम्पत्य प्रेम [श्रृंगार] में दो विभाग होते हैं - मिलन और वियोग। मिलन के मंच पर, अनंत विविधताएँ होती हैं जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।"
 
"There are two divisions of love: union and separation. There are so many differences at the level of love that it is impossible to describe them."
तात्पर्य
विप्रलम्भ का वर्णन उज्जवल-नीलमणि (विप्रलम्भ-प्रकरण 3-4) में किया गया है:

यूनों अयुक्तयोर्भावो युक्तयोर्वाथ यो मिथः

अभिष्टालिङ्गनादीनां अनवाप्तौ प्रकृष्यते

स विप्रलम्भो विज्ञेयः संभोगोन्ति-कारकः

न विना विप्रलम्भेन संभोगः पुष्टिं अश्नुते

"जब प्रेमी और प्रिय मिलते हैं, तो उन्हें युक्त (जुड़ा हुआ) कहा जाता है। उनके मिलने से पहले, उन्हें अयुक्त (अलग) कहा जाता है। चाहे जुड़े या अलग, अवांछित आलिंगन और चुंबन के कारण उत्पन्न उल्लासमय भावना को विप्रलम्भ कहा जाता है। यह विप्रलम्भ मिलने के समय भावनाओं को पोषित करने में मदद करता है।" इसी तरह, संभोग का वर्णन निम्नलिखित श्लोक में किया गया है जो वैदिक साहित्य से श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में उद्धृत किया है:

दर्शनालिङ्गनादीनां अनुकूल्यान निषेवया

यूनों उल्लासं आरोहन् भावः संभोग ईर्यते

"एक दूसरे से मिलना और एक दूसरे को गले लगाना प्रेमी और प्रिय की खुशी लाने के लिए है। जब यह अवस्था अधिक उल्लासमय हो जाती है, तो परिणामी उल्लासमय भावना को संभोग कहा जाता है।" जागने पर, संभोग को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

(1) पूर्व-राग-अनंतर - पूर्व-राग (मिलने से पहले लगाव) के बाद, संभोग को संक्षिप्त (संक्षिप्त) कहा जाता है;

(2) मान-अनंतर - मान (प्रेम पर आधारित क्रोध) के बाद, संभोग को संकीर्ण (संकीर्ण) कहा जाता है;

(3) किञ्चित्-दूर-प्रवास-अनंतर - कुछ समय के लिए थोड़ी दूर रहने के बाद, संभोग को संपन्न (संपन्न) कहा जाता है;

(4) सुदूर-प्रवास-अनंतर - दूर रहने के बाद, संभोग को पूर्णता (समृद्धिमं) कहा जाता है।

प्रेमियों की वह मुलाक़ातें जो सपनों में होती हैं, उनमें भी ये चार विभाग होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)