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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.23.56 
शान्तादि रसेर ‘योग’, ‘वियोग’ - दुइ भेद ।
सख्य - वात्सल्ये योगादिर अनेक विभेद ॥56॥
 
 
अनुवाद
"पाँचों लयों के दो-दो विभाग हैं - योग [संबंध] और वियोग [वियोग]। मैत्री और माता-पिता के स्नेह के लयों में, संबंध और वियोग के भी अनेक विभाग हैं।"
 
"These five rasas have two different kinds of union and separation. The rasas of friendship and love also have many different kinds of union and separation."
तात्पर्य
भक्ति-रसामृत-सिन्धु (3.2.93) में इन विभागों का वर्णन इस प्रकार है:

अयोग-योगावेतास्य प्रभेदौ कथितौ उभौ

“भक्ति-योग के रसों में दो अवस्थाएँ होती हैं — अयोग और योग।” अयोग (वियोग) का वर्णन भक्ति-रसामृत-सिन्धु (3.2.94) में इस प्रकार मिलता है:

संगभावा हरेर धीरैर अयोग इति कथ्यते

अयोगे त्वन्-मनस्कत्वं तद्गुणाघ्यनूसंधयः

तत्प्राप्त्युपायचिंताद्याः सर्वेषां कथिताः क्रियाः

“भक्ति-योग के विज्ञान में ज्ञानी विद्वान कहते हैं कि जब परम व्यक्ति ईश्वर के साथ जुड़ाव नहीं होता है, तो वियोग हो जाता है। अयोग (वियोग) की अवस्था में, मन कृष्ण-भावना से भरा होता है और कृष्ण के विचारों में पूरी तरह से लीन होता है। उस अवस्था में, भक्त परम व्यक्ति ईश्वर के पारलौकिक गुणों की तलाश करता है। यह कहा जाता है कि वियोग की उस अवस्था में, अलग-अलग रसों में सभी भक्त हमेशा कृष्ण की संगति प्राप्त करने के तरीकों के बारे में सोचने में सक्रिय रहते हैं।”

इसलिए शब्द योग (संयोग) का वर्णन भक्ति-रसामृत-सिन्धु (3.2.129) में इस प्रकार है:

कृष्णेन संगमो यस्तु स योग इति कीर्त्यते

"जब कोई व्यक्ति सीधे कृष्ण से मिलता है, तो उसे योग कहा जाता है।"

तटस्थता और दासता के पारलौकिक भावों में, योग और वियोग के समान विभाग होते हैं, परन्तु वे विविध नहीं होते। योग और वियोग के भेद हमेशा पाँचों रसों में होते रहते हैं। परन्तु, मैत्री और माता-पिता के प्रेम के पारलौकिक रसों में योग और वियोग की कई किस्में होती हैं। योग की किस्मों का वर्णन इस प्रकार है:

योगोऽपि कथितः सिद्धि तुष्टि स्थितिरिति त्रिधा

"(संयोग) योग तीन प्रकार का होता है — सफलता, संतुष्टि और स्थिरता।" (B.r.s. 3.2.129) अयोग (वियोग) के विभागों का वर्णन इस प्रकार है:

उत्कंठितं वियोगश्चेत्य अयोगोऽपि द्विधोच्यते

“इस प्रकार अयोग के दो विभाग हैं — लालसा और वियोग।” (B.r.s. 3.2.95)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)