अथोच्यन्ते त्रयस त्रिंशद- भावा ये व्यभिचारिणः
विशेषेणाभिमुख्येन चारन्ति स्थायिनं प्रति
वाग-अंग-सत्त्व-सूच्या ये ज्ञेया ते व्यभिचारिणः
संचारयन्ति भावस्य गतिं संचारिणोपि ते
उन्मज्जंति निमज्जन्ति स्थायिनी अमृत-वारिधौ
उर्मी वद वर्धयन्ति एनं यान्ति तद्-रूपतां च ते
"व्यभिचारी नामक तीस-तीन क्षणिक तत्व या भाव हैं। वे विशेषकर सहायक के रूप में स्थायी भावों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। ये शब्दों के द्वारा, अंगो और शरीर के अन्य भागों में देखे जाने वाले विभिन्न लक्षणों के द्वारा और हृदय की विशिष्ट स्थितियों के द्वारा जाने जाने हैं। चूंकि वे स्थायी भावों की प्रगति को गति प्रदान करते हैं, इसलिए उन्हें विशेष रूप से संचारी या प्रेरक सिद्धांत कहा जाता है। ये प्रेरक सिद्धांत उत्ताप के समुद्र में लहरों की तरह, स्थायी भावों में उठते और गिरते हैं। परिणामस्वरूप इन्हें व्यभिचारी कहा जाता है।"
