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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.23.51 
‘अनुभाव’ - स्मित, नृत्य, गीतादि उद्भास्वर ।
स्तम्भादि - ‘सात्त्विक’ अनुभावेर भितर ॥51॥
 
 
अनुवाद
"उप-आनंद मुस्कुराना, नाचना और गाना है, साथ ही शरीर में विभिन्न अभिव्यक्तियाँ भी हैं। स्तब्ध होने जैसे प्राकृतिक आनंद को उप-आनंद [अनुभाव] माना जाता है।"
 
“Laughing, dancing, singing and various visible symptoms of the body come under Anubhava (subordinate feelings). Satvik feelings like Stambha etc. are considered under Anubhava.”
तात्पर्य
भक्ति-रसामृत-सिंधु (2.2.1) अनुभाव का वर्णन इस प्रकार करता है:

अनुभावास्तु चित्तस्थ- भावानां अवबोधकाः

ते बहिर विक्रिया प्रायः प्रोक्ता उद्भास्वराख्याय

"कई बाहरी हर्षोल्लास के लक्षण, या शारीरिक परिवर्तन जो मन में उत्कट भावनाओं का संकेत देते हैं और जिन्हें उद्भास्वर भी कहा जाता है, अनुभाव हैं, या प्रेम के अधीनस्थ उत्कट भाव।" इन लक्षणों में कुछ नृत्य कर रहे हैं, जमीन पर गिरना और लुढ़कना, बहुत जोर से गाना और रोना, शारीरिक विकृतियाँ, ज़ोरदार कंपन, जम्हाई लेना, गहरी साँस लेना, दूसरों की अवहेलना करना, लार का झाग, पागल हँसी, थूकना, हिचकी और अन्य, समान लक्षण। ये सभी लक्षण दो उपखंडों में बंटे हुए हैं - शीत और क्षेपण। गायन, जम्हाई लेना वगैरह को शीत कहा जाता है। नृत्य और शारीरिक विकृतियाँ क्षेपण कहलाती हैं।

अपने अनुभाष्य में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर उदभास्वर के वर्णन के लिए वैदिक साहित्य से निम्न श्लोक उद्धृत करते हैं:

उद्भासन्ते स्व-धामनीति प्रोक्ता उद्भास्वरा बुधैः

नीव्य-उत्तरियाधम्मिला- स्रंसनं गात्र-मोतनम्

जृम्भा घ्राणस्य फुल्लत्वं निश्वासाद्याश्च ते मताः

"उत्कट प्रेम में एक व्यक्ति के बाहरी शरीर में प्रकट होने वाले उत्कट लक्षणों को विद्वानों द्वारा उद्भास्वर कहा जाता है। इनमें से कुछ बेल्ट का ढीला होना और कपड़े और बालों का गिरना है। अन्य शारीरिक विकृतियाँ, जम्हाई लेना, नथुनों के अगले हिस्से का कांपना, भारी साँस लेना, हिचकी लेना और जमीन पर गिरना और लुढ़कना है। ये भावनात्मक प्रेम की बाहरी अभिव्यक्तियाँ हैं।" स्थंभ और अन्य लक्षण मध्य-लीला 14.167 में वर्णित हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)