श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.23.46 
एइ पञ्च स्थायी भाव हय पञ्च ‘रस’ ।
ये - रसे भक्त ‘सुखी’, कृष्ण हय ‘वश’ ॥46॥
 
 
अनुवाद
"ये पाँच दिव्य रस स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं। भक्त इनमें से किसी एक रस की ओर आकर्षित हो सकता है और इस प्रकार वह सुखी हो जाता है। कृष्ण भी ऐसे भक्त की ओर प्रवृत्त होते हैं और उसके वश में हो जाते हैं।
 
"These five transcendental rasas exist permanently. A devotee can be attracted to any one of them and thus become happy. Krishna also turns toward such a devotee and becomes subservient to him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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