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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.23.45 
अधिकारि - भेदे रति - पञ्च परकार ।
शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आर ॥45॥
 
 
अनुवाद
“इन दिव्य गुणों [स्नेह, मान इत्यादि] को धारण करने वाले अभ्यर्थी के अनुसार, पाँच दिव्य गुण हैं - तटस्थता, दासता, मैत्री, माता-पिता का प्रेम और दाम्पत्य प्रेम।
 
“According to the person possessing these divine qualities (affection, pride etc.), there are five types of Rasa – Shanta, Dasya, Sakhya, Vatsalya and Madhurya.”
तात्पर्य
भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.3.41.44) में, रति (आकर्षण) का वर्णन इस प्रकार है:

व्यक्तं मसृणितेवांतर लक्ष्यते रति-लक्षणम्

मुमुक्षु-प्रभृतीनां चेद भवेदेषा रतिर् न हि

किन्तु बाल-चमत्कार- कार्यितच्- चिह्न-वीक्षण्या

अभिज्ञेन सुबोधोঽयं रत्याभासः प्रकीर्तितः

"प्रेम के बीज (रति) के फलने के वास्तविक लक्षण प्रकट होते हैं क्योंकि हृदय पिघल जाता है। जब ऐसे लक्षण सट्टेबाजों और भोगवादियों के बीच पाए जाते हैं, तो उन्हें लगाव के वास्तविक लक्षणों के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ...भक्ति सेवा के ज्ञान के बिना मूर्ख लोग लगाव के ऐसे लक्षणों की प्रशंसा करते हैं, भले ही वे कृष्ण की सेवा करने की इच्छा के अलावा किसी और चीज पर आधारित हों। हालाँकि, जो भक्ति सेवा में निपुण है वह ऐसे लक्षणों को रत्य-आभास कहता है, लगाव की एक झलक मात्र।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)