व्यक्तं मसृणितेवांतर लक्ष्यते रति-लक्षणम्
मुमुक्षु-प्रभृतीनां चेद भवेदेषा रतिर् न हि
किन्तु बाल-चमत्कार- कार्यितच्- चिह्न-वीक्षण्या
अभिज्ञेन सुबोधोঽयं रत्याभासः प्रकीर्तितः
"प्रेम के बीज (रति) के फलने के वास्तविक लक्षण प्रकट होते हैं क्योंकि हृदय पिघल जाता है। जब ऐसे लक्षण सट्टेबाजों और भोगवादियों के बीच पाए जाते हैं, तो उन्हें लगाव के वास्तविक लक्षणों के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ...भक्ति सेवा के ज्ञान के बिना मूर्ख लोग लगाव के ऐसे लक्षणों की प्रशंसा करते हैं, भले ही वे कृष्ण की सेवा करने की इच्छा के अलावा किसी और चीज पर आधारित हों। हालाँकि, जो भक्ति सेवा में निपुण है वह ऐसे लक्षणों को रत्य-आभास कहता है, लगाव की एक झलक मात्र।"
