श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.23.40 
धन्यस्यायं नव - प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।
अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठ सु - दुर्गमा ॥40॥
 
 
अनुवाद
'जिस महापुरुष के हृदय में भगवत्प्रेम जागृत हो गया हो, उसके कार्यकलापों और लक्षणों को कोई भी विद्वान् विद्वान् भी नहीं समझ सकता।'
 
“Even the greatest scholar cannot understand the actions and characteristics of a great man in whose heart love for God has awakened.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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