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श्लोक 2.23.40  |
धन्यस्यायं नव - प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।
अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठ सु - दुर्गमा ॥40॥ |
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| अनुवाद |
| 'जिस महापुरुष के हृदय में भगवत्प्रेम जागृत हो गया हो, उसके कार्यकलापों और लक्षणों को कोई भी विद्वान् विद्वान् भी नहीं समझ सकता।' |
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| “Even the greatest scholar cannot understand the actions and characteristics of a great man in whose heart love for God has awakened.” |
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