| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम » श्लोक 33 |
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| | | | श्लोक 2.23.33  | रोदन - बिन्दु - मरन्द - स्यन्दि - दृगिन्दीवराद्य गोविन्द ।
तव मधुर - स्वर - कण्ठी गायति नामावली बाला ॥33॥ | | | | | | | अनुवाद | | हे गोविन्द! यह राधिका नामक युवती आज आपके पवित्र नामों का मधुर स्वर में गान करते हुए, फूलों से अमृत की तरह निरंतर अश्रुधारा बहा रही है। | | | | “O Govinda, this young woman named Radhika is continuously shedding tears while singing Your holy name in a sweet voice, as if honey is falling from flowers.” | | ✨ ai-generated | | |
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