तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृत - चित्तमीशे ।
द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशत्वलं गायत विष्णु - गाथाः ॥21॥
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अनुवाद
"हे ब्राह्मणों, मुझे पूर्णतः समर्पित आत्मा के रूप में स्वीकार करो, और भगवान की प्रतिनिधि माँ गंगा भी मुझे उसी रूप में स्वीकार करें, क्योंकि मैंने भगवान के चरणकमलों को अपने हृदय में धारण कर लिया है। सर्पपक्षी - या ब्राह्मण द्वारा रचित कोई भी जादुई वस्तु - मुझे तुरन्त डस ले। मेरी केवल यही इच्छा है कि आप सभी भगवान विष्णु के कार्यों का गान करते रहें।"
"O Brahmins, consider me a completely surrendered soul, and Mother Ganga, the representative of the Lord, should also consider me so, for I have already established the Lord's feet in my heart. Let me immediately cut down this Takshaka, or whatever trick the Brahmin has created. My only wish is that you continue to sing the praises of Lord Vishnu's deeds."
तात्पर्य
यह श्रीमद्भागवत (1.19.15) से ली गयी एक श्लोक है जो महाराजा परीक्षित ने गंगा नदी के किनारे बैठकर कही थी जबकि वे एक पक्षी-सर्प के द्वारा डांसे जाने की आशा कर रहे थे जो कि शृंगी नाम के एक ब्राह्मण बालक के शाप के द्वारा बुलाया गया था। यह बालक शमीक नाम के एक महान ऋषि का पुत्र था। शाप के बारे में खबर राजा के पास पहुँचाई गई, जिन्होंने जल्द ही अपनी मृत्यु की तैयारी की। कई संत, ऋषि, ब्राह्मण, राजा और देवता उन्हें उनके जीवन के अंतिम दिनों को देखने के लिए आए। हालाँकि, महाराज परीक्षित पक्षी-सर्प के काटे जाने से बिल्कुल नहीं डर रहे थे। वास्तव में, उन्होंने सभा में इक्कट्ठा सभी महान व्यक्तित्वों से भगवान विष्णु के पवित्र नामों का जाप करना चालू रखने का अनुरोध किया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥