श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.23.17 
याँहार हृदये एइ भावाङ्कुर हय ।
ताँहाते एतेक चिह्न सर्व - शास्त्रे कय ॥17॥
 
 
अनुवाद
"यदि किसी के हृदय में वास्तव में दिव्य भावना का बीज है, तो उसके कर्मों में उसके लक्षण दिखाई देंगे। सभी शास्त्रों का यही मत है।"
 
"If a person truly has the seed of divine feeling in his heart, it will be reflected in his actions. This is the verdict of all the scriptures."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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