श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.23.13 
सेइ ‘भाव’ गाढ़ हैले धरे ‘प्रेम’ - नाम ।
सेइ प्रेमा ‘प्रयोजन’ सर्वानन्द - धाम ॥13॥
 
 
अनुवाद
"जब वह आनंदमय भावनात्मक अवस्था तीव्र हो जाती है, तो उसे ईश्वर-प्रेम कहते हैं। ऐसा प्रेम ही जीवन का परम लक्ष्य और समस्त आनंद का भण्डार है।"
 
"When such a state of feeling becomes intense, it is called love of God. Such love is the ultimate goal of life and the source of all happiness."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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