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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम  »  श्लोक 117-118
 
 
श्लोक  2.23.117-118 
मौषल - लीला, आर कृष्ण - अन्तर्धान ।
केशावतार, आर यत विरुद्ध व्याख्यान ॥117॥
महिषी - हरण आदि, सब - मायामय ।
व्याख्या शिखाइल यैछे सुसिद्धान्त हय ॥118॥
 
 
अनुवाद
कृष्णभावनामृत के निष्कर्षों के विपरीत भ्रामक कहानियाँ यदुवंश के विनाश, कृष्ण के तिरोभाव, क्षीरोदकशायी विष्णु के एक काले और एक श्वेत रोम से कृष्ण और बलराम के उत्पन्न होने की कथा, तथा रानियों के अपहरण की कथा से संबंधित हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को इन कहानियों के उचित निष्कर्षों की व्याख्या की।
 
The myths that contradict the conclusions of Krishna consciousness relate to the destruction of the Yadu dynasty, the disappearance of Krishna, the creation of Krishna and Balarama from the dark and white hair of Kshirodakasayi Vishnu, and the abduction of the queens. Sri Chaitanya Mahaprabhu explained the correct conclusions of these stories to Sanatana Goswami.
तात्पर्य
ईष्र्या के कारण, बहुत से असुर कृष्ण को काले कौवे या बाल के अवतार की तरह बताते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को बताया कि कैसे कृष्ण के इन सभी आसुरी वर्णनों का प्रतिकार करना है। काका शब्द का अर्थ कौवा है, और केशा का अर्थ बाल है। असुर कृष्ण को कौवों के अवतार, शूद्रों के अवतार (एक काली जाति) और बाल के अवतार के रूप में वर्णित करते हैं, यह नहीं जानते कि केशा शब्द का अर्थ है का-ईशा और का का अर्थ है भगवान ब्रह्मा और ईशा का अर्थ है भगवान। इस प्रकार, केशा शब्द इंगित करता है कि कृष्ण भगवान ब्रह्मा के भगवान हैं।

भगवान कृष्ण के कुछ लीलाओं का उल्लेख महाभारत में मौशल-लीला के रूप में किया गया है। इनमें यादव वंश के विनाश, कृष्ण के अदृश्य होने, एक शिकारी के तीर द्वारा भेदने, कृष्ण के बाल के एक टुकड़े के अवतार होने की कहानी (केशा-अवतार) और महिषी-हरण, कृष्ण की रानियों का अपहरण शामिल है। वास्तव में ये तथ्य नहीं हैं, बल्कि असुरों की घबराहट के लिए संबंधित हैं, जो यह साबित करना चाहते हैं कि कृष्ण एक सामान्य मानव है। वे इस अर्थ में झूठे हैं कि ये लीलाएँ नित्य नहीं हैं, न ही वे पारलौकिक या आध्यात्मिक हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो स्वभाव से ईश्वर के परम व्यक्तित्व, विष्णु की श्रेष्ठता के विरोधी हैं। ऐसे लोगों को असुर कहा जाता है। कृष्ण के बारे में उनकी गलत धारणाएँ हैं। जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है, असुरों को जन्म के बाद जन्म कृष्ण को अधिक से अधिक भूलने का मौका दिया जाता है। इस प्रकार वे असुरों के एक परिवार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और कृष्ण के बारे में घबराहट में रखे जाने पर इस प्रक्रिया को जारी रखते हैं। संन्यासियों की वेशभूषा में असुर भी अपनी ही कल्पनाओं के अनुसार भगवद्-गीता और श्रीमद्-भागवतम् की अलग-अलग तरीकों से व्याख्या करते हैं। इस प्रकार वे जन्म के बाद जन्म असुर बने रहते हैं।

जहां तक ​​केशा-अवतार (बाल के अवतार) का सवाल है, इसका उल्लेख श्रीमद्-भागवतम (2.7.26) में किया गया है। विष्णु पुराण भी कहता है, उज्जहारात्मनः केशौ सित-कृष्णौ महा-बल।

इसी तरह, महाभारत में कहा गया है (आदि-पर्व 189.31-32):

स चापि केशौ हरिर उच्च्कार्त

 एकं शुक्लं अपरं चापि कृष्णं

तौ चापि केशाव आविशतां यदूनां

 कुले स्त्रियौ रोहिणीं देवकीं च

तयोरेको बलभद्रो बभूव

 यो ’सौ श्वेतस तस्य देवस्य केशः

कृष्णो द्वितीयः केशवः संबभूव

 केशः यो ’सौ वर्णतः कृष्ण उक्तः

इस प्रकार श्रीमद्-भागवतम्, विष्णु पुराण और महाभारत में कृष्ण और बलराम को क्रमशः काले बाल और सफेद बाल के अवतार होने के संदर्भ हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने अपने सिर से दो बाल - एक सफेद और एक काला - छीना। ये दोनों बाल यादव वंश के सदस्यों रोहिणी और देवकी के गर्भ में प्रवेश कर गए। बलराम का जन्म रोहिणी से हुआ और कृष्ण का जन्म देवकी से हुआ। इस प्रकार बलराम पहले बाल से प्रकट हुए, और कृष्ण दूसरे बाल से प्रकट हुए। यह भी भविष्यवाणी की गई थी कि असुरों, जो देवताओं के शत्रु हैं, को भगवान विष्णु द्वारा उनके श्वेत और काले पूर्ण विस्तारों द्वारा काट दिया जाएगा और सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान प्रकट होंगे और अद्भुत कार्य करेंगे। इस संबंध में, लघु-भागवतामृत, कृष्णामृत नामक अध्याय, श्लोक 156-164 को देखना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी ने बाल अवतार के बारे में इस तर्क का खंडन किया है, और उनके खंडन का समर्थन श्री बलदेव विद्याभूषण की टिप्पणियों द्वारा किया गया है। इस मामले पर कृष्ण-संदर्भ (29) में और श्रील जीवा गोस्वामी की सर्व-संवादनी नामक व्याख्या में आगे चर्चा की गई है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)