युक्तहार-विहारस्य युक्त-चेष्टस्य कर्मसु
युक्त-स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा
"जो व्यक्ति अपने खाने-पीने, सोने, मनोरंजन और काम-काज की आदतों में संयमी है, वह योग प्रणाली का पालन करके सभी सांसारिक कष्टों को मिटा सकता है.'' कृष्ण-भावना के पंथ का प्रसार करने के लिए, देश, काल और उम्मीदवार के आधार पर संन्यास के अवसरों को सीखना पड़ता है. पश्चिमी देशों में कृष्ण भावना के उम्मीदवार को भौतिक अस्तित्व के त्याग के बारे में सिखाया जाना चाहिए, लेकिन भारत जैसे किसी देश के उम्मीदवार को अलग तरह से सिखाया जाएगा. शिक्षक (आचार्य) को समय, उम्मीदवार और देश पर विचार करना होगा. उन्हें नियमाग्रह के सिद्धांत से बचना चाहिए - यानी उन्हें असंभव को पूरा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. एक देश में जो संभव है, वह दूसरे में संभव नहीं हो सकता. आचार्य का कर्तव्य भक्ति सेवा के सार को स्वीकार करना है. जहाँ तक युक्त-वैराग्य (उचित त्याग) का सवाल है, तो उसमें यहाँ कुछ परिवर्तन हो सकता है. शुष्क संन्यास श्री चैन्न्य महाप्रभु ने वर्जित किया हुआ है, और हमने यह हमारे आध्यात्मिक गुरु, उनकी पारलौकिक कृपा भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर गोस्वामी महाराज से भी सीखा है. भक्ति सेवा के सार पर विचार किया जाना चाहिए, न कि उसके बाहर के साज-सामान की.
सनातन गोस्वामी ने अपना वैष्णव स्मृति, हरि-भक्ति-विलास लिखा, जो विशेष रूप से भारत के लिए था. उन दिनों, भारत कमोवेश स्मार्त-विधि के सिद्धांत का पालन कर रहा था. श्रील सनातन गोस्वामी को इसके साथ तालमेल बिठाना था, और इसी को ध्यान में रखकर हरि-भक्ति-विलास का संकलन किया गया था. स्मार्त-ब्राह्मणों के अनुसार, ब्राह्मण परिवार में जन्मे व्यक्ति को ही ब्राह्मण का पद प्राप्त हो सकता था. लेकिन सनातन गोस्वामी हरि-भक्ति-विलास (2.12) में कहते हैं कि कोई भी आदमी दीक्षा की प्रक्रिया से ब्राह्मण का पद प्राप्त कर सकता है.
यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रस-विधानात:
तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणां
"जब कांस्य धातु को रसायनिक प्रक्रिया द्वारा पारे के साथ मिलाया जाता है, तो वह सोने में बदल जाता है, इसी तरह एक निष्ठावान आध्यात्मिक गुरु द्वारा दीक्षा प्राप्त करने और ठीक तरह से प्रशिक्षित होने वाला व्यक्ति तुरंत ब्राह्मण बन जाता है।''
स्मार्त प्रक्रिया और गोस्वामी प्रक्रिया में अंतर है. स्मार्त प्रक्रिया के अनुसार, कोई व्यक्ति तब तक ब्राह्मण नहीं माना जा सकता, जब तक वह ब्राह्मण परिवार में न जन्मा हो. गोस्वामी प्रक्रिया के अनुसार, हरि-भक्ति-विलास और नारद-पंचरात्र के अनुसार, कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है, यदि उसे किसी निष्ठावान आध्यात्मिक गुरु द्वारा दीक्षा प्राप्त हो. यह श्रीमद्भागवतम (2.4.18) में शुकदेव गोस्वामी का भी निर्णय है:
किराता-हूणाँध्र-पुलिंद-पुलकाशा
अभीर-शुम्भा यवनाः खसादयः
ये 'न्ये च पापा यदपास्रयाश्रयाः
शुध्यंति तस्मै प्रभाविष्णवे नमः
"किरात, हूण, आंध्र, पुलिंद, पुलकाश, अभीर, शुंभ, यवन और खस जातियों के लोग और यहाँ तक कि पाप कर्मों में लिप्त दूसरे लोग भी भगवान के भक्तों का आश्रय लेने से पवित्र हो सकते हैं, क्योंकि वह सर्वोच्च शक्ति हैं। मैं उनके प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।''
एक वैष्णव तुरंत शुद्ध हो जाता है, बशर्ते वह अपने सच्चे आध्यात्मिक गुरु के नियमों और विनियमों का पालन करता हो। यह आवश्यक नहीं है कि भारत में पालन किए जाने वाले नियम और विनियम यूरोप, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में ठीक वैसा ही हो। बिना किसी प्रभाव के केवल नकल करने को नियमग्रह कहा जाता है। विनियमक सिद्धांतों का पालन न करना बल्कि इसके बजाय अपव्ययपूर्ण ढंग से जीवन जीना भी नियमग्रह कहलाता है। नियम शब्द का अर्थ है "विनियमक सिद्धांत" और आग्रह का अर्थ है "उत्सुकता"। अग्रह शब्द का अर्थ है "स्वीकार नहीं करना"। हमें बिना किसी प्रभाव के विनियमक सिद्धांतों का पालन नहीं करना चाहिए, और न ही हमें विनियमक सिद्धांतों को स्वीकार करने में विफल होना चाहिए। जो आवश्यक है वह देश, समय और उम्मीदवार के अनुसार एक विशेष तकनीक है। आध्यात्मिक गुरु के अनुमोदन के बिना, हमें नकल करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इस सिद्धांत की यहाँ सिफ़ारिश की गई है: शुष्क-वैराग्य-ज्ञान सब निषेधिला। यह श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्ति पंथ का उदार प्रदर्शन है। हमें सच्चे आध्यात्मिक गुरु के अनुमोदन के बिना कुछ भी सनकीपन से नहीं पेश करना चाहिए। इस संदर्भ में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने श्री रूप गोस्वामी (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.255-256) द्वारा दो छंदों को उद्धृत करके इन बिंदुओं पर टिप्पणी की है।
अनासक्तस्य विषयान् यथार्हम उपयुंजत:
निर्बंध: कृष्ण-संबंधे युक्तं वैराग्यं उच्यते
प्रापंचिकतया बुद्ध्या हरि-संबंधि-वस्तुन:
मुमुक्षुभि: पारित्यागो वैराग्यं फलु कत्यते
"जब किसी को किसी चीज़ से लगाव नहीं होता है, लेकिन साथ ही कृष्ण के संबंध में सब कुछ स्वीकार करता है, तो वह निश्चित रूप से अधिकार से ऊपर स्थित होता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति कृष्ण से उसके संबंध के ज्ञान के बिना सब कुछ त्याग देता है, वह अपने त्याग में उतना पूर्ण नहीं होता।" भक्ति पंथ का प्रचार करने के लिए, इन श्लोकों पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।
