| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 23: जीवन का चरम लक्ष्य -भगवत्प्रेम » श्लोक 101 |
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| | | | श्लोक 2.23.101  | सङ्क्षेपे कहिलुँ एइ ‘प्रयोजन’ - विवरण ।
पञ्चम - पुरुषार्थ - एइ ‘कृष्ण - प्रेम’ - धन ॥101॥ | | | | | | | अनुवाद | | "यह संक्षिप्त वर्णन जीवन के परम लक्ष्य का विस्तार है। वास्तव में, यही पाँचवाँ और परम लक्ष्य है, जो मोक्ष के स्तर से परे है। इसे कृष्ण-प्रेम-धन कहा जाता है, जो कृष्ण-प्रेम का खजाना है।" | | | | "This brief description is an elaboration of the ultimate goal of life. Indeed, this is the fifth and final goal, which is beyond the state of liberation. It is called the wealth of love for Krishna." | | ✨ ai-generated | | |
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