भक्त - वत्सल, कृतज्ञ, समर्थ, वदान्य ।
हेन कृष्ण छाड़ि’ पण्डित नाहि भजे अन्य ॥95॥
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अनुवाद
"भगवान कृष्ण अपने भक्तों के प्रति अत्यंत दयालु हैं। वे सदैव अत्यंत कृतज्ञ और उदार हैं, और उनमें सभी क्षमताएँ विद्यमान हैं। एक विद्वान व्यक्ति किसी अन्य की पूजा करने के लिए कृष्ण का त्याग नहीं करता।
"Krishna is extremely kind to his devotees. He is always extremely grateful and generous and is full of all capabilities. Wise people do not abandon Krishna to worship anyone else."
तात्पर्य
बुद्धिमान व्यक्ति उन लोगों का साथ छोड़ देता है जो स्त्रियों में आसक्त हैं और कृष्ण-भावना से रहित हैं। व्यक्ति को सभी प्रकार के भौतिक आसक्तियों से मुक्त होना चाहिए और कृष्ण के चरण-कमलों की पूर्ण शरण लेनी चाहिए। कृष्ण अपने भक्तों के प्रति बहुत दयालु हैं। वह हमेशा कृतज्ञ रहते हैं, और वह अपने भक्तों की सेवा को कभी नहीं भूलते। वह पूर्ण संपन्न और सर्व-शक्तिशाली भी हैं। तो, फिर क्यों किसी को देवता की शरण लेनी चाहिए और भगवान कृष्ण की शरण छोड़ देनी चाहिए? यदि कोई देवता की पूजा करता है और कृष्ण को छोड़ देता है, तो उसे सबसे बड़ा मूर्ख समझा जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥