श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.22.93 
एत सब छा ड़ि’ आर वर्णाश्रम - धर्म ।
अकिञ्चन हञा लय कृष्णैक - शरण ॥93॥
 
 
अनुवाद
"बिना किसी हिचकिचाहट के, पूर्ण विश्वास के साथ भगवान कृष्ण की अनन्य शरण ग्रहण करनी चाहिए, बुरी संगति त्याग देनी चाहिए और यहाँ तक कि चारों वर्णों और चारों आश्रमों के नियमों की भी उपेक्षा करनी चाहिए। अर्थात्, मनुष्य को समस्त भौतिक आसक्ति का त्याग कर देना चाहिए।"
 
"One should abandon bad company and disregard the rules of the four classes and four ashramas and take sole refuge in Lord Krishna with complete faith and without any doubt. This means that one should renounce all material attachments."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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