ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च ।
प्रेम - मैत्री - कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥73॥
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अनुवाद
"मध्यम, द्वितीय श्रेणी का भक्त भगवान के प्रति प्रेम प्रदर्शित करता है, सभी भक्तों के प्रति मैत्रीपूर्ण होता है और नवदीक्षितों तथा अज्ञानी लोगों पर अत्यंत दयालु होता है। मध्यम भक्त उन लोगों की उपेक्षा करता है जो भक्ति सेवा से ईर्ष्या करते हैं।
"The moderate devotee shows love for the Supreme Personality of Godhead, is friendly toward all devotees, and is extremely kind to new devotees and ignorant persons. He ignores those who are jealous of devotion."
तात्पर्य
यह भी श्रीमद भागवतम् (11.2.46) से एक उद्धरण है। यह वक्तव्य महान संत नारद द्वारा दिया गया था जबकि वे वासुदेव से भक्ति के विषय में बात कर रहे थे। इस विषय पर मूल रूप से विदेह के राजा निमि और नौ योगेन्द्रों के बीच चर्चा हुई थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥