भक्ति का स्तर भी उसी प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। एक नवोदित का मानना है कि केवल कृष्ण प्रेम या कृष्ण चेतना ही बहुत अच्छा है, लेकिन वह शुद्ध कृष्ण चेतना के आधार को या कैसे कोई एक पूर्ण भक्त बन सकता है, ये नहीं जानता। कभी-कभी एक नवोदित के ह्रदय में कर्म, ज्ञान या योग के लिए आकर्षण होता है। जब वह स्वतंत्र और मिश्रित धार्मिक गतिविधि से परे होता है तो वह द्वितीय श्रेणी का भक्त बन जाता है। जब वह तर्क में निपुण हो जाता है और शास्त्रों को बता सकता है, तो वह प्रथम श्रेणी का भक्त बन जाता है। कृष्ण के लिए उनके प्रेम और लगाव के अनुसार भक्तों को सकारात्मक, तुलनात्मक और अतिशय श्रेष्ठ के रूप में भी वर्णित किया गया है।
ये समझ लेना चाहिए कि मध्यम अधिकारी, द्वितीय श्रेणी का भक्त कृष्ण चेतना के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त होता है लेकिन अपने विश्वासों को शास्त्रीय संदर्भों से समर्थन नहीं कर पाता। एक नवोदित गैर-भक्तों के संपर्क में आकर गिर सकता है क्योंकि उसका विश्वास दृढ़ नहीं होता और वह दृढ़ता से स्थित नहीं होता। द्वितीय श्रेणी का भक्त, भले ही वह शास्त्रीय संदर्भों के साथ अपनी स्थिति का समर्थन नहीं कर पाता, शास्त्रों का अध्ययन करके और प्रथम श्रेणी के भक्त के साथ संगति करके धीरे-धीरे एक प्रथम श्रेणी का भक्त बन सकता है। फिर भी, अगर द्वितीय श्रेणी का भक्त प्रथम श्रेणी के भक्त के साथ संगति करके खुद को आगे नहीं बढ़ाता, तो उसकी कोई तरक्की नहीं होती। इसमें कोई संभावना नहीं है कि प्रथम श्रेणी का भक्त गिरेगा, जबकि वह प्रचार करने के लिए गैर-भक्तों के साथ घुल सकता है। दृढ़ विश्वास और श्रद्धा धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और उसे उत्तम-अधिकारी या प्रथम श्रेणी का भक्त बनाती है।
