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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  2.22.71 
रति - प्रेम - तारतम्ये भक्त - तर - तम ।
एकादश स्कन्धे तार करियाछे लक्षण ॥71॥
 
 
अनुवाद
"भक्त को उसकी आसक्ति और प्रेम के अनुसार श्रेष्ठ या श्रेष्ठ माना जाता है। श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में निम्नलिखित लक्षण बताए गए हैं।
 
"A devotee is considered superior or the best according to his devotion and love. The following characteristics are set out in the Eleventh Canto of the Srimad Bhagavatam."
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने कहा है कि अगर कृष्ण चेतना में किसी की श्रद्धा हो तो उसे कृष्ण चेतना में आगे बढ़ने का उम्मीदवार माना जाएगा। जिनमें श्रद्धा है उन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है - उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ श्रेणी। एक प्रथम श्रेणी के भक्त में प्रकटित लेखों में दृढ़ विश्वास होता है और वह शास्त्रों के हिसाब से तर्क करने में निपुण होता है। कृष्ण चेतना के विज्ञान में उसका दृढ़ विश्वास है। मध्यम-अधिकारी या द्वितीय श्रेणी के भक्त में कृष्ण चेतना में दृढ़ विश्वास होता है पर शास्त्रीय सन्दर्भ देते हुए अपना विश्वास नहीं जता पाता है। नवोदित भक्त में अभी दृढ़ विश्वास नहीं होता है। इस प्रकार से भक्तों को वर्गीकृत किया गया है।

भक्ति का स्तर भी उसी प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। एक नवोदित का मानना है कि केवल कृष्ण प्रेम या कृष्ण चेतना ही बहुत अच्छा है, लेकिन वह शुद्ध कृष्ण चेतना के आधार को या कैसे कोई एक पूर्ण भक्त बन सकता है, ये नहीं जानता। कभी-कभी एक नवोदित के ह्रदय में कर्म, ज्ञान या योग के लिए आकर्षण होता है। जब वह स्वतंत्र और मिश्रित धार्मिक गतिविधि से परे होता है तो वह द्वितीय श्रेणी का भक्त बन जाता है। जब वह तर्क में निपुण हो जाता है और शास्त्रों को बता सकता है, तो वह प्रथम श्रेणी का भक्त बन जाता है। कृष्ण के लिए उनके प्रेम और लगाव के अनुसार भक्तों को सकारात्मक, तुलनात्मक और अतिशय श्रेष्ठ के रूप में भी वर्णित किया गया है।

ये समझ लेना चाहिए कि मध्यम अधिकारी, द्वितीय श्रेणी का भक्त कृष्ण चेतना के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त होता है लेकिन अपने विश्वासों को शास्त्रीय संदर्भों से समर्थन नहीं कर पाता। एक नवोदित गैर-भक्तों के संपर्क में आकर गिर सकता है क्योंकि उसका विश्वास दृढ़ नहीं होता और वह दृढ़ता से स्थित नहीं होता। द्वितीय श्रेणी का भक्त, भले ही वह शास्त्रीय संदर्भों के साथ अपनी स्थिति का समर्थन नहीं कर पाता, शास्त्रों का अध्ययन करके और प्रथम श्रेणी के भक्त के साथ संगति करके धीरे-धीरे एक प्रथम श्रेणी का भक्त बन सकता है। फिर भी, अगर द्वितीय श्रेणी का भक्त प्रथम श्रेणी के भक्त के साथ संगति करके खुद को आगे नहीं बढ़ाता, तो उसकी कोई तरक्की नहीं होती। इसमें कोई संभावना नहीं है कि प्रथम श्रेणी का भक्त गिरेगा, जबकि वह प्रचार करने के लिए गैर-भक्तों के साथ घुल सकता है। दृढ़ विश्वास और श्रद्धा धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और उसे उत्तम-अधिकारी या प्रथम श्रेणी का भक्त बनाती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)