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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.22.7 
अद्वय - ज्ञान - तत्त्व कृष्ण - स्वयं भगवान् ।
‘स्वरूप - शक्ति’ रूपे ताँर हय अवस्थान ॥7॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण अद्वैत परम सत्य हैं, भगवान् हैं। यद्यपि वे एक हैं, फिर भी वे अपनी लीलाओं के लिए विभिन्न व्यक्तिगत विस्तार और शक्तियाँ धारण करते हैं।
 
"Krishna is the non-dual Absolute Truth, the Supreme Personality of Godhead. Although He is one, He has various aspects and potencies for His pastimes."
तात्पर्य
भगवान के पास कई शक्तियाँ हैं, और वह इन सभी शक्तियों से भिन्न नहीं हैं। क्योंकि क्षमताएं और शक्तिशाली को अलग नहीं किया जा सकता है, इसलिए वे समान हैं। कृष्ण को सभी शक्तियों के स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है, और उनकी पहचान बाहरी शक्ति, भौतिक ऊर्जा से भी की जाती है। कृष्ण के पास आंतरिक शक्तियाँ या आध्यात्मिक शक्तियाँ भी हैं, जो हमेशा उनकी व्यक्तिगत सेवा में लगी रहती हैं। उनकी आंतरिक शक्ति उनकी बाहरी शक्ति से अलग है। कृष्ण की आंतरिक शक्ति और स्वयं कृष्ण, जो शक्तिशाली हैं, हमेशा समान होते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)