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श्लोक 2.22.61  |
तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।
मत्कथा - श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥61॥ |
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| अनुवाद |
| 'जब तक मनुष्य सकाम कर्म से तृप्त नहीं होता और श्रवणं कीर्तनं विष्णुः द्वारा भक्ति के प्रति उसकी रुचि जागृत नहीं होती, तब तक उसे वैदिक आदेशों के नियामक सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना होता है।' |
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| “Until a man is satisfied with fruitful actions and awakens his interest in devotion through Shravanm Kirtanam Vishnoh, he has to perform actions according to the Vedas.” |
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