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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.22.53 
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाड्छि स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः ।
महीयसां पाद - रजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥53॥
 
 
अनुवाद
"जब तक मानव समाज महान महात्माओं के चरणकमलों की धूलि को स्वीकार नहीं करता - ऐसे भक्त जिनका भौतिक संपत्ति से कोई लेना-देना नहीं है - तब तक मानवजाति कृष्ण के चरणकमलों की ओर अपना ध्यान नहीं लगा सकती। वे चरणकमल भौतिक जीवन की सभी अवांछित, दयनीय स्थितियों का नाश करते हैं।"
 
"Until human society accepts the dust from the feet of the great souls—devotees who have no attachment to material possessions—humankind cannot turn its attention to the feet of Lord Krishna. Those feet are the removers of all unwanted sufferings of material life."
तात्पर्य
यह श्लोक श्रीमद्भागवत (7.5.32) में आता है। जब महान संत नारद, महाराज युधिष्ठिर को निर्देश दे रहे थे, तो उन्होंने प्रह्लाद महाराज के कार्यों का वर्णन किया। इस श्लोक को प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता हिरण्यकश्यप, राक्षसों के राजा, से कहा था। प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता को भक्ति-योग की नौ बुनियादी प्रक्रियाओं के बारे में बताया था, यह समझाते हुए कि जो कोई भी इस प्रक्रिया को अपनाता है, उसे बहुत पढ़ा-लिखा पंडित माना जाना चाहिए। हालाँकि, हिरण्यकश्यपु को यह पसंद नहीं था कि उनका पुत्र भक्तिपूर्ण सेवा के बारे में बात करे; इसलिए उन्होंने तुरंत प्रह्लाद के शिक्षक शंड को बुलाया। शिक्षक ने समझाया कि उसने प्रह्लाद को भक्तिपूर्ण सेवा नहीं सिखाई है, लेकिन वह लड़का स्वाभाविक रूप से उस ओर झुकता था। उस समय, हिरण्यकश्यपु बहुत क्रोधित हो गए और उन्होंने प्रह्लाद से पूछा कि वह वैष्णव कैसे बन गया। इस प्रश्न के उत्तर में, प्रह्लाद महाराज ने यह श्लोक सुनाया कि कोई दूसरे भक्त की दया और आशीर्वाद के बिना प्रभु का भक्त नहीं बन सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)