रहूगणैतत्तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणा द्गृहाद्वा ।
न च्छन्दसा नैव जलाग्नि - सूर्यैर् विना महत्पाद - रजोऽभिषेकम् ॥52॥
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अनुवाद
“हे राजा रहूगण, किसी शुद्ध भक्त [महाजन या महात्मा] के चरणकमलों की धूल अपने मस्तक पर धारण किए बिना, कोई भी भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। भक्ति केवल कठोर तपस्या और तप करने, विग्रह की भव्य पूजा करने, या संन्यास या गृहस्थ आश्रम के नियमों का कड़ाई से पालन करने से प्राप्त नहीं हो सकती; न ही यह वेदों का अध्ययन करने, जल में डुबकी लगाने, या अग्नि या चिलचिलाती धूप में रहने से प्राप्त होती है।’
"O King Rahugana, one cannot attain devotion without placing the dust of the lotus feet of a pure devotee (mahajana or mahatma) on one's head. Devotion cannot be attained merely by performing severe austerities, grandly worshipping the Deity, or strictly observing the rules of renunciation or householdership, or by studying the Vedas, or by immersing oneself in water, or by sitting in the fire or in the hot sun."
तात्पर्य
यह श्लोक श्रीमद् भागवतम् (5.12.12) में प्रकट होता है। यह श्लोक जड़ भारत द्वारा राजा राहुगण को बताया गया है कि उन्होंने कैसे परमहंस अवस्था प्राप्त की। सिंधु-सौवीर के राजा महाराज राहुगण ने जड़ भारत से पूछा था कि उन्होंने परमहंस अवस्था कैसे प्राप्त की। राजा ने उन्हें अपनी पालकी ले जाने के लिए बुलाया था, लेकिन जब राजा ने परमहंस जड़ भारत से परम दर्शन के बारे में सुना, तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया और जड़ भारत से पूछा कि उन्होंने इतनी महान मुक्ति कैसे प्राप्त की। उस समय जड़ भारत ने राजा को बताया कि भौतिक आकर्षण से कैसे अलग हुआ जाए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥