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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  2.22.51 
महत्कृपा विना कोन कर्मे ‘भक्ति’ नय ।
कृष्ण - भक्ति दूरे रहु, संसार नहे क्षय ॥51॥
 
 
अनुवाद
"जब तक किसी शुद्ध भक्त की कृपा न मिले, तब तक वह भक्ति के स्तर को प्राप्त नहीं कर सकता। कृष्ण-भक्ति की तो बात ही छोड़िए, वह भव-बन्धन से भी मुक्त नहीं हो सकता।
 
"Without the grace of a pure devotee, no one can attain the state of devotion. Forget about devotion to Krishna, a human being cannot even escape the bondage of material existence."
तात्पर्य
हिंदी-पाठ्यः

धर्ममय कर्मों से भौतिक सम्पन्नता तो आती है, परंतु भौतिक धर्ममय कर्मों से भक्ति नहीं मिलती। भक्ति तो शुद्ध भक्त की कृपा से ही प्राप्त होती है। दान, अस्पताल और पाठशालाओं का निर्माण करना और परोपकार करना आदि सभी से भक्ति नहीं मिलती। शुद्ध भक्त की कृपा के बिना तो भौतिक जंजाल से मुक्ति भी नहीं मिलती। इस श्लोक में शब्द महात्मा का अर्थ है "शुद्ध भक्त", जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद् गीता में अर्जुन से कहा था 9.13 में कि:

"हे पृथापुत्र अर्जुन! जो भक्त भ्रम में नहीं होते, वे महात्मा कहलाते हें वे ईश्वरीय प्रकृति का आश्रय लेते हैं और मुझे भगवान के रूप में जानकर अविचल भाव से मेरी पूजा करते हैं।"

इस प्रकार के महात्मा की संगति करनी चाहिए जिसने कृष्ण को सृष्टि के स्रोत के रूप में स्वीकार किया है। महात्मा बने बिना कृष्ण की सर्वोपरि स्थिति नहीं समझी जा सकती। महात्मा दुर्लभ और अलौकिक होती है और वे भगवान कृष्ण के विशुद्ध भक्त होते हैं। मूर्ख लोग कृष्ण को साधारण मनुष्य मानते हैं और कृष्ण के विशुद्ध भक्तों को भी साधारण मानवीय प्राणी मानते हैं। जो कोई भी हो, वह भक्त महात्मा के चरणों में शरण लेना चाहिए और उसे समाज का सबसे बड़ा हितैषी समझना चाहिए। हमें ऐसे ही महात्मा की शरण लेनी चाहिए और उनकी अकारण दया मांगनी चाहिए। केवल उन्ही की कृपा से भौतिक जीवन से आसक्ति मुक्त हो सकते हैं। जब कोई ऐसे आसक्ति मुक्त हो जाता है, वह महात्मा की कृपा से भगवान की अलौकिक भक्ति-सेवा में संलग्न हो सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)