श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.22.50 
यदृच्छया मत्कथा दौ जात - श्रद्धस्तु यः पुमान् ।
न निर्विण्णो नाति - सक्तो भक्ति - योगोऽस्य सिद्धि - दः ॥50॥
 
 
अनुवाद
“‘किसी न किसी तरह, यदि कोई मेरे विषय में की जाने वाली बातों के प्रति आकर्षित होता है और भगवद्गीता में मेरे द्वारा बताए गए निर्देशों में विश्वास रखता है, और यदि वह न तो भौतिक वस्तुओं से मिथ्या रूप से विरक्त है और न ही भौतिक अस्तित्व के प्रति अत्यधिक आकर्षित है, तो भक्ति सेवा द्वारा मेरे प्रति उसका सुप्त प्रेम जागृत हो जाएगा।’
 
“If someone is somehow attracted to My story and has faith in My teachings as given in the Bhagavad Gita, and if the person does not have false attachment to material things and is also not overly attached to the material world, then his dormant love for Me will be awakened through devotion.”
तात्पर्य
यह पद श्रीमद-भागवतम (11.20.8 ) से है जिसे कृष्ण ने इस भौतिक संसार से अपने प्रस्थान के समय बोला था। यह पद उद्धव के लिए बोला गया था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)