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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.22.45 
कोन भाग्ये कारो संसार क्षयोन्मुख हय ।
साधु - सङ्गे तबे कृष्णे रति उपजय ॥45॥
 
 
अनुवाद
"सौभाग्य से मनुष्य अज्ञान रूपी सागर को पार करने के योग्य हो जाता है, और जब उसकी भवसागर की अवधि कम हो जाती है, तो उसे शुद्ध भक्तों की संगति का अवसर मिल सकता है। ऐसी संगति से कृष्ण के प्रति आकर्षण जागृत होता है।"
 
"By good fortune, a person is able to cross the ocean of ignorance and, when the duration of his material existence is reduced, he may have the opportunity to associate with pure devotees. Such association awakens his attraction for Krishna."
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर इस मुद्दे को समझाते हैं. क्या यह भाग्य दुर्घटना का परिणाम है, या कुछ और है? शास्त्रों में भक्ति सेवा और धार्मिक कार्य भाग्यशाली माना जाता है. धार्मिक कार्यों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:- धार्मिक कार्य जो किसी की निद्रित कृष्ण चेतना को जगाते हैं, उन्हें भक्तः-उन्मुखी सुकृत कहते हैं, धार्मिक कार्य जो भौतिक वैभव प्रदान करता है, उसे भोगः-उन्मुखी सुकृत कहा जाता है, और धार्मिक कार्य जो जीव को परम के अस्तित्व में विलय करने में सक्षम बनाते हैं, उन्हें मोक्षोन्मुखी सुकृत कहा जाता है. धार्मिक गतिविधि के ये अंतिम दो पुरस्कार वास्तव में भाग्यशाली नहीं हैं. धार्मिक कार्य तब भाग्यशाली होते हैं जब वे किसी को कृष्णचेतन बनाने में मदद करते हैं. भक्तः-उन्मुखी का सौभाग्य तभी मिलता है जब कोई किसी भक्त के संपर्क में आता है. किसी भक्त से स्वेच्छा से या अनिच्छा से जुड़ने पर व्यक्ति भक्ति सेवा में उन्नति करता है, और इस तरह उसकी निष्क्रिय कृष्ण चेतना जागृत होती है.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)