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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.22.43 
संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे ।
नदीर प्रवाहे येन काष्ठ लागे तीरे ॥43॥
 
 
अनुवाद
"बद्ध आत्माएँ ब्रह्मांड के विभिन्न लोकों में विचरण करती रहती हैं और विभिन्न योनियों में प्रवेश करती रहती हैं। सौभाग्यवश इनमें से कोई एक आत्मा किसी न किसी प्रकार अज्ञान के सागर से मुक्त हो सकती है, जैसे बहती नदी में पड़े अनेक बड़े लट्ठों में से कोई एक संयोगवश किनारे तक पहुँच जाता है।
 
"Conditioned souls wander through the various realms of the universe, passing through various species of life. Fortunately, one of these individuals may somehow be liberated from the ocean of ignorance, just as one of the many large logs in a flowing river may suddenly reach the shore."
तात्पर्य
असीमित सशर्त आत्माएँ हैं जो भगवान कृष्ण की सेवा से वंचित हैं। अज्ञानता के सागर को पार करने का मार्ग न जानते हुए, समय और ज्वार की लहरों से वे बिखर जाती हैं। हालाँकि, कुछ भाग्यशाली भक्तों से सम्पर्क करने को परम सौभाग्य मानते हैं, और इस संपर्क से उन्हें अज्ञानता के सागर से मुक्ति मिल जाती है, जैसे नदी में बहता एक लॉग गलती से किनारे पर बह जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)