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अनुवाद
"'चूँकि मैं बहुत बुद्धिमान हूँ, इसलिए इस मूर्ख को भौतिक समृद्धि क्यों दूँ? इसके बजाय मैं इसे अपने चरणकमलों की शरण का अमृत पिलाऊँगा और इसे मायावी भौतिक भोगों से विस्मृत कराऊँगा।'
"Since I am so wise, why should I give this fool material prosperity? Instead, I will inspire him to take refuge in the nectar of My feet and make him forget his illusory desire for material enjoyment."
तात्पर्य
जो भौतिक सुखों में रूचि रखते हैं उन्हें भोगी कहा जाता है। जो ब्रह्म के तेज में विलीन होने या योग प्रणाली को सिद्ध करने में रूचि रखता है वह भक्त नहीं है। भक्तों की ऐसी इच्छाएँ नहीं होती हैं। हालाँकि, अगर कोई कर्मी, ज्ञानी या योगी किसी तरह किसी भक्त से संपर्क करके भक्तिमय सेवा करता है, तो कृष्ण तुरंत उसे ईश्वर के प्रति प्रेम प्रदान करते हैं और उसे अपने चरणों में आश्रय प्रदान करते हैं, भले ही उसे यह पता न हो कि कैसे कृष्ण के प्रति प्रेम का विकास किया जाता है। अगर कोई व्यक्ति भक्तिमय सेवा से भौतिक लाभ चाहता है, तो कृष्ण ऐसी भौतिकवादी इच्छाओं की निंदा करते हैं। भक्तिमय सेवा करते हुए भौतिक संपन्नता की इच्छा करना मूर्खता है। यद्यपि व्यक्ति मूर्ख हो सकता है, कृष्ण, सर्वज्ञ होने के कारण, उसे अपनी भक्तिमय सेवा में इस तरह से व्यस्त करते हैं कि वह धीरे-धीरे भौतिक संपन्नता को भूल जाता है। मुद्दा यह है कि हमें भौतिक समृद्धि के लिए प्रेमपूर्ण सेवा का आदान-प्रदान करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। अगर हम वास्तव में कृष्ण के चरणों में समर्पित हैं, तो हमारी एकमात्र इच्छा कृष्ण को संतुष्ट करने की होनी चाहिए। यही शुद्ध कृष्णभावनामाता है। समर्पण का अर्थ यह नहीं है कि हम भगवान से कुछ माँगें बल्कि यह है कि हम उनकी दया पर पूरी तरह से निर्भर रहें। अगर कृष्ण चाहें, तो वह अपने भक्त को गरीबी से त्रस्त स्थिति में रख सकते हैं, या अगर वह चाहें तो वे उसे एक संपन्न स्थिति में रख सकते हैं। भक्त को किसी भी स्थिति में चिंतित नहीं होना चाहिए; उसे बस प्रभु को सेवा करके संतुष्ट करने का प्रयास करने के प्रति गंभीर होना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥