शश्वत प्रशांत अभयं प्रतिबोध-मात्रं
शुद्धं समं सदसताः परमात्मा-तत्त्वम्
शब्दो न यत्र पुरु-कारकवान क्रियार्थो
माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना
तद् वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो
ब्रह्मेति यद् विदुर अजस्र-सुखं विशोकम्
"जिसे परम ब्रह्मा के रूप में जाना जाता है वह दुख के बिना असीम आनंद से भरा है। वह निश्चित रूप से सर्वोच्च आनंददाता श्री भगवान का आखिरी चरण है। वह सभी विकर्षणों से शाश्वत रूप से रहित, निडर, पदार्थ के विपरीत पूर्ण चैतन्य, अदूषित और भेद रहित है। वह सभी कारणों और प्रभावों का प्रमुख, आदिम कारण है, जिसमें फलदायी गतिविधियों के लिए कोई त्याग नहीं है और जिसमें मायावी ऊर्जा खड़ी नहीं होती है।"
यह पद भगवान ब्रह्मा ने बोला था जब उनसे महान ऋषि नारद ने प्रश्न किया था। नारद ब्रह्मांड के निर्माता को ध्यान करते देखकर हैरान थे, क्योंकि यह संकेत करता था कि भगवान ब्रह्मा से भी कोई महान हो सकता है। महान ऋषि नारद को जवाब देते समय, भगवान ब्रह्मा ने माया और भ्रमित जीवों की स्थिति का वर्णन किया। यह श्लोक उसी संबंध में बोला गया था।
