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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.22.32 
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षा - पथेऽमुया ।
विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥32॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की बाह्य माया, जिसे माया कहते हैं, कृष्ण के सामने खड़े होने में सदैव लज्जित होती है, जैसे अंधकार सूर्य के प्रकाश के सामने रहने में लज्जित होता है। हालाँकि, वह माया उन अभागे लोगों को मोहग्रस्त कर देती है जिनमें बुद्धि नहीं होती। इस प्रकार वे केवल यह दावा करते हैं कि यह भौतिक जगत उनका है और वे इसके भोगी हैं।"
 
"Krishna's external enchanting power, called Maya, is always ashamed to stand before Krishna, just as darkness is ashamed to stand before the sunlight. But Maya bewitches those unfortunate people who lack intelligence. They simply boast that this material world belongs to them and that they are its enjoyers."
तात्पर्य
संपूर्ण विश्व हैरान हैं क्योंकि लोग सोचते हैं, "यह मेरी भूमि हैं", "अमेरिका मेरी है", "भारत मेरा है"। जीवन के वास्तविक मूल्य को न जानते हुए, लोग सोचते हैं कि भौतिक शरीर और वह भूमि जहाँ यह पैदा हुआ है, सब कुछ यही है। राष्ट्रवाद, समाजवाद और साम्यवाद के पीछे मूल सिद्धांत यही है। ऐसी सोच, जो केवल जीव को हैरान करती है, सिर्फ बदमाशी के अलावा कुछ नहीं है। यह माया के अंधकार के कारण है। लेकिन जैसे ही कोई कृष्ण-सचेत होता है, वह तुरंत ऐसी गलत धारणाओं से मुक्त हो जाता है। यह पद श्रीमद-भागवतम (2.5.13) से उद्धृत है। श्रीमद-भागवतम (2.7.47) में एक और उपयुक्त श्लोक है:

शश्वत प्रशांत अभयं प्रतिबोध-मात्रं

शुद्धं समं सदसताः परमात्मा-तत्त्वम्

शब्दो न यत्र पुरु-कारकवान क्रियार्थो

माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना

तद् वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो

ब्रह्मेति यद् विदुर अजस्र-सुखं विशोकम्

"जिसे परम ब्रह्मा के रूप में जाना जाता है वह दुख के बिना असीम आनंद से भरा है। वह निश्चित रूप से सर्वोच्च आनंददाता श्री भगवान का आखिरी चरण है। वह सभी विकर्षणों से शाश्वत रूप से रहित, निडर, पदार्थ के विपरीत पूर्ण चैतन्य, अदूषित और भेद रहित है। वह सभी कारणों और प्रभावों का प्रमुख, आदिम कारण है, जिसमें फलदायी गतिविधियों के लिए कोई त्याग नहीं है और जिसमें मायावी ऊर्जा खड़ी नहीं होती है।"

यह पद भगवान ब्रह्मा ने बोला था जब उनसे महान ऋषि नारद ने प्रश्न किया था। नारद ब्रह्मांड के निर्माता को ध्यान करते देखकर हैरान थे, क्योंकि यह संकेत करता था कि भगवान ब्रह्मा से भी कोई महान हो सकता है। महान ऋषि नारद को जवाब देते समय, भगवान ब्रह्मा ने माया और भ्रमित जीवों की स्थिति का वर्णन किया। यह श्लोक उसी संबंध में बोला गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)