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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.22.26 
चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे ।
स्वकर्म करिते से रौरवे प ड़ि’ मजे ॥26॥
 
 
अनुवाद
"वर्णाश्रम संस्था के अनुयायी चार सामाजिक वर्णों [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र] और चार आध्यात्मिक वर्णों [ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास] के नियामक सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं। हालाँकि, यदि कोई इन वर्णों के नियामक सिद्धांतों का पालन करता है, लेकिन कृष्ण की दिव्य सेवा नहीं करता है, तो वह भौतिक जीवन की नारकीय स्थिति में गिर जाता है।
 
"Followers of the Varnashrama system observe the rules and regulations of the four varnas (brahmins, kshatriyas, vaishyas, and shudras) and the four ashramas (celibacy, householders, vanaprasthas, and renunciation). If they follow these rules but do not render devotional service to Lord Krishna, they fall into the hellish state of material life."
तात्पर्य
कोई व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो सकता है, या वह ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास के आध्यात्मिक सिद्धांतों का पूर्ण रूप से पालन कर सकता है, लेकिन अंततः व्यक्ति स्वयं को निम्नतर दशा में पाता है जब तक कि वह भक्त नहीं बन जाता है। कृष्ण चेतना को जागृत किये बिना, व्यक्ति वास्तविक रूप से उन्नत नहीं हो सकता है। वर्णाश्रम-धर्म के नियमन सिद्धांत स्वयं में सर्वोच्च पूर्णता प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं हैं। श्रीमद्-भागवतम (11.5.2-3) के निम्नलिखित दो उद्धरणों में इसकी पुष्टि की गई है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)