ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन ।
माया - जाल छुटे, पाय कृष्णेर चरण ॥25॥
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अनुवाद
“यदि बद्धजीव भगवान की सेवा में लग जाए और साथ ही अपने आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का पालन करे और उनकी सेवा करे, तो वह माया के चंगुल से निकल सकता है और कृष्ण के चरण कमलों की शरण का पात्र बन सकता है।
“If the conditioned soul engages in the service of the Lord and also obeys and serves his spiritual master, he can be freed from the snares of Maya and become worthy of taking refuge at the lotus feet of Krishna.”
तात्पर्य
यह एक तथ्य है कि हर जीवित प्राणी शाश्वत रूप से कृष्ण का सेवक है। यह माया के प्रभाव के कारण भुला दिया जाता है, जो कि यह मानने के लिए प्रेरित करता है कि भौतिक सुख ही है। माया द्वारा भ्रमित होकर, कोई सोचता है कि भौतिक सुख ही एकमात्र वांछनीय वस्तु है। यह भौतिक चेतना उस शर्तित आत्मा की गर्दन के चारों ओर एक जंजीर की तरह है। जब तक वह उस गर्भधारण से बंधा है, वह माया के चंगुल से बाहर नहीं निकल सकता। हालाँकि, अगर कृष्ण की दया से वह एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के संपर्क में आता है, उसके आदेश का पालन करता है और उसकी सेवा करता है, अन्य शर्तित आत्माओं को भगवान की सेवा में लगाता है, तो वह मुक्ति पाता है और भगवान श्री कृष्ण की शरण ग्रहण करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥