केवल सैद्धांतिक ज्ञान द्वारा मुक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती है। भले ही कोई ब्रह्म और पदार्थ के बीच अंतर करने में सक्षम हो, लेकिन उसकी मुक्ति में बाधा तब आएगी जब उसे यह सोचने के लिए गुमराह किया जाता है कि जीवित प्राणी भगवान के समान ही अच्छा है। दरअसल, कोई खुद को परम व्यक्ति, परम सत्य मानकर भौतिक मंच पर फिर से गिर जाता है, जो कि आक्रामक है। जब ऐसा व्यक्ति किसी शुद्ध भक्त के संपर्क में आता है, तो वह वास्तव में भौतिक बंधन से मुक्त हो सकता है और भगवान की सेवा में संलग्न हो सकता है। बिल्वमंगल ठाकुर की एक प्रार्थना यहाँ प्रासंगिक है:
भक्तिस त्वयि स्थिरतरा भगवन यदि स्याद्
दैवेन नः फलति दिव्य-किशोर-मूर्तिः
मुक्तिः स्वयं मुकुलितांजलि सेवते ऽस्मान्
धर्माथ-काम-गपयाः समय-प्रतीक्षाः
"हे मेरे भगवान, यदि कोई आपके शुद्ध भक्ति सेवा में दृढ़ता से जुड़ता है, तो आप अपने मूल पारलौकिक युवा रूप में भगवान के रूप में दिखाई देते हैं। जहाँ तक मुक्ति का संबंध है, वह भक्त के सामने हाथ जोड़कर सेवा करने के लिए इंतजार करती है। धर्म, आर्थिक विकास और इंद्रिय तृप्ति सभी स्वचालित रूप से अलग प्रयास के बिना प्राप्त होते हैं।" (कृष्ण-करनामृत 107)
