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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.22.19 
नैष्कर्म्यमप्यच्युत - भाव - वर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥19॥
 
 
अनुवाद
"जब शुद्ध ज्ञान समस्त भौतिक आसक्तियों से परे होता है, किन्तु भगवान् [कृष्ण] को समर्पित नहीं होता, तो वह बहुत सुन्दर नहीं लगता, यद्यपि वह भौतिक रंग से रहित ज्ञान होता है। तो फिर, सकाम कर्मों का क्या उपयोग है - जो प्रारम्भ से ही दुःखदायी और क्षणभंगुर होते हैं - यदि उनका उपयोग भगवान् की भक्ति के लिए न किया जाए? वे बहुत आकर्षक कैसे हो सकते हैं?"
 
"When pure knowledge is beyond all material attractions but is not surrendered to the Supreme Personality of Godhead (Krishna), it does not appear very beautiful even though it is free from material impurities. So what is the use of fruitive activities, which are initially painful and temporary, if they are not used in the devotional service of the Lord? How can they be so attractive?"
तात्पर्य
यह श्रीमद भागवतम (1.5.12) का उद्धरण है। अनेकों वैदिक साहित्य लिखने के बाद भी व्यासदेव बहुत निराश महसूस करते थे। इसलिए उनके आध्यात्मिक गुरु नारददेव ने उन्हें बताया कि वे भगवान का वर्णन करके खुश हो सकते हैं। उस समय तक, श्रील व्यासदेव ने वेदों के कर्मकांड और ज्ञानकांड खंड लिखे थे, लेकिन उन्होंने उपासनाकांड, या भक्ति के बारे में नहीं लिखा था। इसलिए उनके आध्यात्मिक गुरु नारद ने उन्हें दंडित किया और उन्हें भगवान की गतिविधियों के बारे में लिखने की सलाह दी। इसलिए व्यासदेव ने श्रीमद भागवतम लिखना शुरू किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)