स वं पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे
अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति
"सभी मानवता के लिए सर्वोच्च व्यवसाय [धर्म] वह है जिसके द्वारा मनुष्य पारलौकिक भगवान के प्रति प्रेममय भक्ति सेवा प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी भक्ति सेवा पूरी तरह से आत्म को संतुष्ट करने के लिए निःस्वार्थ और निर्बाध होनी चाहिए।" कर्म, ज्ञान और योग वास्तव में ईश्वर के लिए प्रेम को नहीं जगा सकते। व्यक्ति को भगवान की भक्ति सेवा को अपनाना होता है, और जितना अधिक व्यक्ति भक्ति सेवा के लिए इच्छुक होता है, उतना ही वह अन्य तथाकथित उपलब्धियों में रुचि खो देता है। ध्रुव महाराज व्यक्तिगत रूप से भगवान को आमने-सामने देखने के लिए रहस्यमय योग का अभ्यास करने गए थे, लेकिन जब उन्होंने भक्ति सेवा में रुचि विकसित की, तो उन्होंने देखा कि उन्हें कर्म, ज्ञान और योग से लाभ नहीं हो रहा था।
