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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.22.18 
एइ सब साधनेर अति तुच्छ बल ।
कृष्ण - भक्ति विना ताहा दिते नारे फल ॥18॥
 
 
अनुवाद
"भक्ति के बिना, आध्यात्मिक आत्म-साक्षात्कार के अन्य सभी उपाय दुर्बल और महत्वहीन हैं। जब तक कोई भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन नहीं हो जाता, ज्ञान और योग वांछित परिणाम नहीं दे सकते।
 
"Without devotion, all other means of self-realization are weak and insignificant. Without devotion to Krishna, knowledge and yoga cannot yield the desired results."
तात्पर्य
वैदिक धर्मग्रंथों में कभी-कभी काम्य कर्म, सैद्धांतिक ज्ञान और रहस्यवादी योग प्रणाली पर भी बल दिया गया है। हालांकि लोग इन प्रक्रियाओं का अभ्यास करने के इच्छुक हैं, लेकिन कृष्ण-भक्ति, भक्ति सेवा द्वारा स्पर्श किए बिना वे वांछित परिणाम प्राप्त नहीं कर सकते। दूसरे शब्दों में, वास्तविक वांछित परिणाम कृष्ण के लिए निष्क्रिय प्रेम को आमंत्रित करना है। श्रीमद-भागवतम (1.2.6) में कहा गया है:

स वं पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे

अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति

"सभी मानवता के लिए सर्वोच्च व्यवसाय [धर्म] वह है जिसके द्वारा मनुष्य पारलौकिक भगवान के प्रति प्रेममय भक्ति सेवा प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी भक्ति सेवा पूरी तरह से आत्म को संतुष्ट करने के लिए निःस्वार्थ और निर्बाध होनी चाहिए।" कर्म, ज्ञान और योग वास्तव में ईश्वर के लिए प्रेम को नहीं जगा सकते। व्यक्ति को भगवान की भक्ति सेवा को अपनाना होता है, और जितना अधिक व्यक्ति भक्ति सेवा के लिए इच्छुक होता है, उतना ही वह अन्य तथाकथित उपलब्धियों में रुचि खो देता है। ध्रुव महाराज व्यक्तिगत रूप से भगवान को आमने-सामने देखने के लिए रहस्यमय योग का अभ्यास करने गए थे, लेकिन जब उन्होंने भक्ति सेवा में रुचि विकसित की, तो उन्होंने देखा कि उन्हें कर्म, ज्ञान और योग से लाभ नहीं हो रहा था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)