श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 166
 
 
श्लोक  2.22.166 
याहा हैते पाइ कृष्णेर प्रेम - सेवन ।
एइत’ कहिलुँ ‘अभिधेय’ - विवरण ॥166॥
 
 
अनुवाद
“जिसके द्वारा मनुष्य भगवान की प्रेममयी सेवा प्राप्त कर सकता है, उसे मैंने भक्तिमय सेवा के रूप में विस्तार से वर्णित किया है, जिसे अभिधेय कहा जाता है।
 
“I have described in detail the method by which the loving devotion of the Lord can be attained in the form of the accomplishment of devotion called Abhidheya.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)