सहजता के मंच पर स्थित एक उन्नत भक्त पहले से ही शास्त्रीय निर्देश, तर्क और तर्क में बहुत निपुण होता है। जब वह कृष्ण के लिए अटूट प्रेम की बात पर आता है, तो कोई भी उसे तर्क या शास्त्रीय प्रमाणों से उस स्थिति से विचलित नहीं कर सकता। एक उन्नत भक्त ने प्रभु के साथ अपने शाश्वत संबंध को महसूस किया है, और परिणामस्वरूप वह दूसरों के तर्क और तर्कों को स्वीकार नहीं करता। ऐसे उन्नत भक्त का सहाजियों से कोई लेना-देना नहीं है, जो अपना रास्ता बनाते हैं और व्यभिचार, नशा और जुए में लिप्त होकर पाप करते हैं, यदि मांस नहीं खाते हैं। कभी-कभी सहाजिए उन्नत भक्तों की नकल करते हैं और प्रकट शास्त्रों में निर्धारित सिद्धांतों से बचते हुए, अपने स्वयं के सनकी तरीके से रहते हैं। जब तक व्यक्ति छह गोस्वामियों का अनुसरण नहीं करता - श्री रूप, सनातन, रघुनाथ भट्ट, श्री जीव, गोपाल भट्ट और रघुनाथ दास - तब तक वह कृष्ण का वास्तविक सहज प्रेमी नहीं हो सकता। इस संबंध में, श्रील नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं, "रूप-रघुनाथ-पदे हैबे आक़ुति काबे हम बुझबा से युगल प्रीति।" राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों के बारे में सहाजियों की समझ वास्तविक नहीं है क्योंकि वे छह गोस्वामियों द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन नहीं करते। उनका अवैध संबंध और रूप गोस्वामी की पोशाक की नकल, साथ ही साथ प्रकट शास्त्रों के निर्धारित तरीकों के बहिष्कार, उन्हें नरक के निम्नतम क्षेत्रों तक ले जाएंगे। ये नकलची सहाजिए ठगे हुए और दुर्भाग्यपूर्ण हैं। वे उन्नत भक्तों (परमहंसों) के समान नहीं हैं। दुराचारियों और परमहंसों का स्तर एक जैसा नहीं होता।
