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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  2.22.146 
तस्मान्मद्भक्ति - युक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः ।
न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥146॥
 
 
अनुवाद
'जो व्यक्ति मेरी भक्ति में पूर्णतया तत्पर है, जिसका मन भक्तियोग में मुझमें स्थिर है, उसके लिए चिन्तनशील ज्ञान और शुष्क त्याग का मार्ग अधिक लाभदायक नहीं है।'
 
“For one who is completely engaged in My devotion, whose mind is fixed in My devotional service, the path of logical knowledge and dry detachment is not of much benefit.”
तात्पर्य
भक्ति भावना का मार्ग सदैव अन्य गतिविधियों से स्वतंत्र होता है। सैद्धांतिक ज्ञान का मार्ग और योग का मार्ग प्रारंभ में थोड़ा लाभदायक हो सकते हैं, लेकिन उसको भक्ति भावना का अंग नहीं माना जा सकता है। यह वचन (श्रीमद्भागवतम 11.20.31) भगवान कृष्ण ने तब बोला था जब वे इस भौतिक संसार से प्रस्थान के पहले उद्धव से बात कर रहे थे। ये भगवान कृष्ण के द्वारा सीधे दिए गए कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश हैं। श्री उद्धव ने भगवान से वेदों में बताए गए दो प्रकार के निर्देशों के बारे में पूछा था। निर्देशों में से एक को प्रवृत्ति-मार्ग कहा जाता है और दूसरे को निवृत्ति-मार्ग कहा जाता है। ये भोग नियमों के अनुसार भौतिक संसार का आनंद उठाने और फिर उच्चतर आध्यात्मिक समझ के लिए भौतिक संसार को त्यागने के निर्देश हैं। कभी-कभी कोई व्यक्ति यह नहीं जानता है कि आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति के लिए सैद्धांतिक ज्ञान और योग का अभ्यास करना है या नहीं। कृष्ण उद्धव को समझाते हैं कि भक्ति भावना में उन्नति के लिए सैद्धांतिक ज्ञान और योग की यांत्रिक प्रक्रिया आवश्यक नहीं है। भक्ति भावना पूरी तरह आध्यात्मिक होती है। इसका भौतिक चीजों से कोई लेना-देना नहीं होता है। यह भक्तों की संगति में सुनने और जप करने से जागृत होती है। क्योंकि भक्ति भावना सदैव भौतिकवादी होती है, इसलिए इसका भौतिक गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)