अज्ञाने वा हय यदि ‘पाप’ उपस्थित ।
कृष्ण ताँरे शुद्ध करे, ना कराय प्रायश्चित्त ॥143॥
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अनुवाद
"यदि कोई भक्त गलती से किसी पाप कर्म में लिप्त हो जाता है, तो कृष्ण उसे शुद्ध कर देते हैं। उसे प्रायश्चित के किसी भी प्रकार के नियम से नहीं गुजरना पड़ता।
"But if a devotee accidentally indulges in sinful activities, Krishna purifies him. He does not have to perform ritualistic atonement."
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम (11.5.42) के निम्नलिखित पद में वर्णित है कि कैसे कृष्ण चैत्य्य-गुरु, हृदय के भीतर विद्यमान अध्यात्मिक गुरु के रूप में भीतर से शुद्ध करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥