श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.22.133 
दुरूहाद्भुत - वीर्येऽस्मिन्श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके ।
यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भाव - जन्मने ॥133॥
 
 
अनुवाद
"इन पाँच सिद्धांतों की शक्ति अत्यंत अद्भुत और समझने में कठिन है। इनमें श्रद्धा न होने पर भी, एक निश्छल व्यक्ति इनसे थोड़ा-सा जुड़कर ही अपने सुप्त कृष्ण प्रेम को जागृत कर सकता है।"
 
"The power of these five principles is amazing and difficult to understand. Even a person without guilt and faith, with even a slight connection to them, can awaken dormant love for Krishna."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd