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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.22.132 
नाम - सङ्कीर्तनं श्रीमन्मथुरा - मण्डले स्थितिः ॥132॥
 
 
अनुवाद
“‘व्यक्ति को सामूहिक रूप से भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहिए और वृन्दावन में निवास करना चाहिए।’
 
“The devotee should chant the holy name of the Lord in congregation and reside in Vrindavan.”
तात्पर्य
श्रील नरतत्तम दास ठाकुर ने गाया है :

श्री गौड मंडल भूमि, येबा जाने सम चिन्तमणि,

तार हाया व्रजभुमी वास

"नवद्वीप की अलौकिक प्रकृति और उसके आसपास के क्षेत्र को समझने वाला व्यक्ति, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने अतीत का प्रदर्शन किया था, हमेशा वृंदावन में रहता है।" इसी तरह, जगन्नाथपुरी में रहना वृंदावन में रहने के समान है। निष्कर्ष यह है कि नवद्वीप-धाम, जगन्नाथपुरी-धाम और वृंदावन-धाम सर्वथा एक समान है।

हालाँकि, यदि कोई मात्र इंद्रियों के सुख लेने या अपनी आजीविका के लिए मथुरा-मंडल-भूमि जाता है, तो वह अपराध करता है और भ्रष्ट हो जाता है। ऐसा करने वाले को अगले जन्म में वृंदावन-धाम में सूअर या बंदर बनने के द्वारा दंडित किया जाना चाहिए। ऐसे शरीर को प्राप्त करने के बाद, अपराधी अगले जीवन में मुक्त हो जाता है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने कहा है कि इंद्रिय तृप्ति का आनंद लेने के लिए वृंदावन में निवास निश्चित रूप से एक तथाकथित भक्त को निचली प्रजातियों में ले जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)