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अनुवाद
' 'मनुष्य को शुद्ध भक्तों की संगति में श्रीमद्भागवत के अर्थ का आस्वादन करना चाहिए, तथा ऐसे भक्तों की संगति करनी चाहिए जो अपने से अधिक उन्नत हों तथा भगवान के प्रति समान स्नेह रखते हों।
"One should savor the meaning of the Srimad Bhagavatam in the company of pure devotees. He should associate with devotees who are more advanced than himself and who are as devoted to God as he is."
तात्पर्य
शब्द 'सजातयाशये स्निग्धे साधु संगः स्वतो वरे' अति महत्त्वपूर्ण हैं। पेशेवर भागवत पाठकों से जुड़ना नहीं चाहिए। पेशेवर भागवत पाठक का अर्थ है जो वैष्णव परंपरा में नहीं हो या जिसमें भक्ति योग की रुचि नहीं हो। केवल व्याकरण और शब्दों के लेन-देन के बल पर, पेशेवर भागवत पाठक श्रीमद् भागवत पढ़ने से अपने शरीर और इंद्रिय तृप्ति की इच्छाओं को पूरा करते हैं। जिन्हें भगवान विष्णु और उनके भक्तों से विमुखता हो, जो मायावादी हों, जो 'हरे कृष्ण मंत्र' के जाप का अपमान करते हों, जो केवल वैष्णवों या तथाकथित गोस्वामियों की तरह वेश करते हों और जो वैदिक मंत्रों को बेचने और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए श्रीमद् भागवत का पाठ करते हों, उनसे भी बचना चाहिए। ऐसे भौतिकवादी लोगों से श्रीमद् भागवत को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वैदिक नियम के अनुसार, 'यस्य देवे परा भक्तिः' श्रीमद् भागवत का पाठ केवल वही कर सकता है जिसकी कृष्ण के चरण कमलों और उनके भक्त, आध्यात्मिक गुरु के चरणों में अटूट श्रद्धा है। श्रीमद् भागवत को आध्यात्मिक गुरु से समझने का प्रयास करना चाहिए। वैदिक नियम कहता है, 'भक्त्या भागवतं ग्राह्यं न बुद्ध्या न च टीकाया' श्रीमद् भागवत को भक्ति भाव के माध्यम से और शुद्ध भक्त के पाठ को सुनकर समझना होगा। ये वैदिक साहित्य - श्रुति और स्मृति की आज्ञाएँ हैं। जो लोग वैष्णव परंपरा में नहीं हैं और शुद्ध भक्त नहीं हैं, वे श्रीमद् भागवत और श्रीमद् भगवद गीता के वास्तविक रहस्यमय उद्देश्य को नहीं समझ सकते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥