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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.22.129 
सकल - साधन - श्रेष्ठ एइ पञ्च अङ्ग ।
कृष्ण - प्रेम जन्माय एइ पाँचेर अल्प सङ्ग ॥129॥
 
 
अनुवाद
"भक्ति के ये पाँच अंग सर्वश्रेष्ठ हैं। इन पाँचों का थोड़ा सा भी अनुष्ठान कृष्ण के प्रति प्रेम जागृत कर देता है।"
 
"These five aspects of devotion are the most important of all. If even a little of these five are practiced, love for Krishna is awakened."
तात्पर्य
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने बताया है कि कार्तिक मास में विशेष व्रतों का पालन करने तक तैंतीस वस्तुएँ होती हैं। इन तैंतीस वस्तुओं में चार अन्य वस्तुएँ जुड़ जाती हैं - जैसे: शरीर के विभिन्न हिस्सों में तिलक लगाना, पूरे शरीर पर भगवान के नाम लिखना, देवता की माला स्वीकार करना और चरणामृत स्वीकार करना। इन चार वस्तुओं को कवीराज गोस्वामी ने अर्चना यानी देवता की पूजा में शामिल माना है। हालाँकि, इन वस्तुओं का यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन इन्हें पिछली तैंतीस वस्तुओं में जोड़ा जाना चाहिए। इस प्रकार, कुल संख्या तैंतीस हो जाती है। इन तैंतीस में पाँच अन्य वस्तुएँ जोड़ी जानी चाहिए: भक्तों के साथ संगति करना, हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करना, नियमित रूप से श्रीमद-भागवतम का पाठ करना, कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में रहना और देवता की अत्यधिक श्रद्धा और आदर के साथ पूजा करना। तैंतीस वस्तुओं के साथ ये पाँच वस्तुएँ मिलाकर कुल बयालीस हो जाती हैं। यदि हम इन बयालीस वस्तुओं में पिछली बीस वस्तुओं को जोड़ते हैं, तो कुल संख्या साठ हो जाती हैं। ऊपर बताई गई पाँच वस्तुएँ पहले बताई गई वस्तुओं को दोहराती हैं। भक्ति-रसामृत-सिंधु में, श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं:

"अंगानम पंचकस्यस्य पूर्वा-विलिखितस्य च

निकहिला-श्रैष्ठ्य-बोधाय पुनर अप्यत्र शंसनम्"

"इन पाँच वस्तुओं [भक्तों के साथ संगति करना, पवित्र नाम का जाप करना आदि] का महिमागान भक्ति सेवा के इन पाँच अभ्यासों की पूर्ण श्रेष्ठता को बताना है।"

भक्ति सेवा की साठ वस्तुओं में शरीर, मन और इंद्रियों की सभी गतिविधियाँ शामिल हैं। इस प्रकार, साठ वस्तुएँ भक्त को हर दृष्टि से भक्ति सेवा में संलग्न करती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)