"अंगानम पंचकस्यस्य पूर्वा-विलिखितस्य च
निकहिला-श्रैष्ठ्य-बोधाय पुनर अप्यत्र शंसनम्"
"इन पाँच वस्तुओं [भक्तों के साथ संगति करना, पवित्र नाम का जाप करना आदि] का महिमागान भक्ति सेवा के इन पाँच अभ्यासों की पूर्ण श्रेष्ठता को बताना है।"
भक्ति सेवा की साठ वस्तुओं में शरीर, मन और इंद्रियों की सभी गतिविधियाँ शामिल हैं। इस प्रकार, साठ वस्तुएँ भक्त को हर दृष्टि से भक्ति सेवा में संलग्न करती हैं।
