किताब का आंशिक अध्ययन सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहिए कि पवित्र ग्रंथों को उद्धृत करने की क्षमता से अपने आप को एक महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। इसलिए हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन में हमने वैदिक साहित्यों के अपने अध्ययन को भगवद-गीता, श्रीमद-भागवतम्, चैतन्य-चरितामृत और भक्ति-रसामृत-सिंधु तक सीमित कर दिया है। ये चार कार्य प्रचार उद्देश्यों के लिए पर्याप्त हैं। वे दर्शन की समझ और पूरी दुनिया में मिशनरी गतिविधियों के प्रसार के लिए पर्याप्त हैं। यदि कोई व्यक्ति एक विशेष पुस्तक का अध्ययन करता है, तो उसे पूरी तरह से करना चाहिए। यही सिद्धांत है। सीमित संख्या में पुस्तकों का गहन अध्ययन करके, कोई व्यक्ति दर्शन को समझ सकता है।
