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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  2.22.118 
अवैष्ण व - सङ्ग - त्याग, बहु - शिष्य ना करिब ।
बहु - ग्रन्थ - कलाभ्यास - व्याख्यान वर्जिब ॥118॥
 
 
अनुवाद
बारहवीं बात है अभक्तों की संगति त्याग देना। (13) असीमित संख्या में शिष्यों को स्वीकार नहीं करना चाहिए। (14) केवल संदर्भ देने और व्याख्याओं का विस्तार करने के लिए बहुत से शास्त्रों का आंशिक अध्ययन नहीं करना चाहिए।
 
"The twelfth limb is to shun the company of nondevotees. (13) One should not make numerous disciples. (14) One should not study many scriptures incompletely, merely for the sake of providing evidence and commenting on them."
तात्पर्य
अनिश्चित संख्या में श्रद्धालुओं या शिष्यों को स्वीकार करना उनके लिए बेहद जोखिम भरा है जो प्रचारक नहीं हैं। श्रीला जीव गोस्वामी के अनुसार, प्रचारक को श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ का विस्तार करने के लिए बहुत से शिष्य स्वीकार करने पड़ते हैं। यह जोखिम भरा इसलिए है क्योंकि जब एक आध्यात्मिक गुरु शिष्य को स्वीकार करते हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से शिष्य के पाप कर्मों और उनके प्रतिफल को स्वीकार करते हैं। जब तक वो बहुत शक्तिशाली नहीं हो जाते हैं, वे अपने शिष्यों के सभी पाप कर्म और उनके प्रतिफल को आत्मसात नहीं कर सकते हैं और इसके परिणामों को झेलना पड़ता है। इसलिए आम तौर पर कई शिष्य स्वीकार करने की मनाही है।

किताब का आंशिक अध्ययन सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहिए कि पवित्र ग्रंथों को उद्धृत करने की क्षमता से अपने आप को एक महान विद्वान के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। इसलिए हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन में हमने वैदिक साहित्यों के अपने अध्ययन को भगवद-गीता, श्रीमद-भागवतम्, चैतन्य-चरितामृत और भक्ति-रसामृत-सिंधु तक सीमित कर दिया है। ये चार कार्य प्रचार उद्देश्यों के लिए पर्याप्त हैं। वे दर्शन की समझ और पूरी दुनिया में मिशनरी गतिविधियों के प्रसार के लिए पर्याप्त हैं। यदि कोई व्यक्ति एक विशेष पुस्तक का अध्ययन करता है, तो उसे पूरी तरह से करना चाहिए। यही सिद्धांत है। सीमित संख्या में पुस्तकों का गहन अध्ययन करके, कोई व्यक्ति दर्शन को समझ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)