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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.22.109 
राग - हीन जन भजे शास्त्रेर आज्ञाय ।
‘वैधी भ क्ति’ बलि’ तारे सर्व - शास्त्रे गाय ॥109॥
 
 
अनुवाद
"जो लोग भक्ति में सहज आसक्ति की अवस्था प्राप्त नहीं कर पाए हैं, वे किसी प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों में वर्णित विधि-विधानों के अनुसार भक्ति करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस प्रकार की भक्ति को वैधी भक्ति कहा जाता है।
 
Those who have not attained raganuga bhakti practice devotion under the guidance of a bona fide guru, according to the scriptures. According to the scriptures, such devotion is called valid devotion.
तात्पर्य
प्रारंभ में किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु से सुनना आवश्यक है। भक्ति-भावना में उन्नति के लिए यह अनुकूल है। इस प्रक्रिया के अनुसार व्यक्ति आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में, सुनता है, जप करता है, स्मरण करता है और देव-पूजा में लगा रहता है। ये भक्ति-भावना की मूलभूत प्राथमिक क्रियाएं हैं। भक्ति-भावना का अभ्यास भौतिक लाभों के लिए नहीं करना चाहिए। व्यक्ति को परम सत्य में विलीन होने की इच्छा भी नहीं रखनी चाहिए। ऐसी सेवा केवल प्रेम से ही करनी चाहिए। अहैतुकी अ-प्रतिहता। भक्ति-भावना बिना किसी छुपे हुए उद्देश्य के होनी चाहिए; तब भौतिक स्थितियाँ इसे रोक नहीं सकती हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति सहज प्रेममय सेवा के स्तर तक उठ सकता है। एक विद्यार्थी को शिक्षा प्राप्त करने के लिए जबरदस्ती स्कूल भेजा जाता है, पर थोड़ी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, वह खुद ही इसमें भाग लेता है और एक विद्वान विद्यार्थी बन जाता है। किसी व्यक्ति को विद्वान बनाने के लिए उसे जबरदस्ती नहीं किया जा सकता, लेकिन कभी-कभार प्रारंभ में जबरदस्ती की जाती है। एक बच्चे को जबरदस्ती स्कूल जाना होता है और अपने शिक्षक के निर्देशों के अनुसार लिखना और पढ़ना होता है। वैधी भक्ति और सहज भक्ति का अंतर यही है। कृष्ण के प्रति प्रेम हर किसी के हृदय में सुषुप्त अवस्था में होता है, और भक्ति-भावना की व्यवस्थित प्रक्रिया द्वारा इसे केवल जगाना होता है। किसी को टाइपराइटर सीखना है, तो उसे टाइपिंग पुस्तक के नियमित सिद्धांतों का पालन करना होगा। उसे अपनी अंगुलियाँ इस तरीके से कुंजियों पर रखनी होती हैं और अभ्यास करना होता है, लेकिन जब वह दक्ष हो जाता है, तो वह बिना कुंजियों को देखे सटीक और तेजी से टाइप कर सकता है। इसी तरह, भक्ति भावना के नियमों और कायदों का पालन करना होता है, जैसे उन्हें आध्यात्मिक गुरु ने निर्देश दिया है; तभी व्यक्ति सहज प्रेमभावपूर्ण सेवा के स्तर तक पहुँच सकता है। यह प्रेम पहले से ही सभी के हृदय में स्थित है (नित्य-सिद्ध कृष्ण-प्रेम)।

सहज सेवा कृत्रिम नहीं है। उस स्तर तक पहुँचने के लिए, व्यक्ति को केवल नियमित सिद्धांतों के अनुसार भक्ति-भावना अर्पित करनी होती है। इसलिए व्यक्ति को मंदिर को साफ करने, स्वयं को शुद्ध करने, तड़के उठने, मंगला-आरती में शामिल होने आदि द्वारा सुनने और जप करने का अभ्यास करना होता है और अन्य नियमित सिद्धांतों का पालन करना होता है। यदि व्यक्ति प्रारंभ में सहज सेवा के स्तर तक नहीं आ पाता है, तो उसे आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों के अनुसार, नियमित सेवा अपनानी चाहिए। इस नियमित सेवा को वैधी भक्ति कहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)