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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 22: भक्ति की विधि  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.22.100 
रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा ।
आत्म - निक्षेप - कार्पण्ये षड् - विधा शरणागतिः ॥100॥
 
 
अनुवाद
' 'समर्पण के छह प्रकार हैं - भक्ति के अनुकूल वस्तुओं को स्वीकार करना, प्रतिकूल वस्तुओं को त्यागना, यह विश्वास कि कृष्ण सुरक्षा प्रदान करेंगे, भगवान को अपना संरक्षक या स्वामी मानना, पूर्ण आत्म-समर्पण और विनम्रता।
 
“The six divisions of surrender are: acceptance of what is favorable to devotion, rejection of what is unfavorable, complete faith in Krishna's protection, acceptance of the Lord as protector or master, complete surrender, and humility.”
तात्पर्य
जो पूर्णतः समर्पित होते हैं उन्हें निम्नलिखित छः विशेषताओं से पहचाना जा सकता है: (1) भक्त को प्रभु के लिए अनुकूल दिव्य और प्रेमपूर्ण सेवा करने के लिए हर चीज़ स्वीकार करनी होती है। (2) उसे प्रभु की सेवा के लिए प्रतिकूल चीज़ों को त्यागना होता है। इसे त्याग भी कहा जाता है। (3) एक भक्त को दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि कृष्ण उसे सुरक्षा देंगे। कोई और वास्तव में सुरक्षा नहीं दे सकता है, और इस पर दृढ़ता से विश्वास करना ही विश्वास कहलाता है। इस प्रकार का विश्वास उस निराकारवादी के विश्वास से अलग है जो बार-बार जन्म और मृत्यु से बचने के लिए ब्रह्म तेज में विलीन होना चाहता है। एक भक्त हमेशा प्रभु की सेवा में ही रहना चाहता है। इस तरह कृष्ण अपने भक्त पर दया करते हैं और उन्हें भक्ति के मार्ग पर आने वाले खतरों से पूरी सुरक्षा देते हैं। (4) भक्त को कृष्ण को अपना सर्वोच्च रक्षक और स्वामी स्वीकार करना चाहिए। उसे ऐसी सोच नहीं होनी चाहिए कि उसे किसी देवता द्वारा सुरक्षा मिल रही है। उसे केवल कृष्ण पर ही निर्भर रहना चाहिए और उन्हें अपना एकमात्र रक्षक मानना चाहिए। भक्त को इस पर दृढ़ता से विश्वास होना चाहिए कि तीनों लोकों में कृष्ण के अलावा उसका कोई और रक्षक या धारण करने वाला नहीं है। (5) आत्मसमर्पण का मतलब है यह याद रखना कि किसी के काम और इच्छाएं स्वतंत्र नहीं होती हैं। भक्त पूरी तरह से कृष्ण पर निर्भर है, और वह वैसे ही कार्य और विचार करता है जैसा कृष्ण चाहते हैं। (6) भक्त नम्र और विनम्र होता है।

भगवान कृष्ण ने भगवद गीता (15.15) में कहा है:

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो

 मत्तः स्मृतिर् ज्ञानमपोहणं च

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो

 वेदान्त-कृद्वेद-विदेव चा-हम्‌

"मैं हर किसी के हृदय में विराजमान हूं और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान, और विस्मृति आती है। सभी वेदों द्वारा केवल मुझे ही जाना जा सकता है। निश्चित ही, मैं वेदांत का संकलनकर्ता हूँ, और मैं ही वेदों का ज्ञाता हूं।" हर किसी के हृदय में विराजमान होकर कृष्ण प्राणी की स्थिति के अनुसार अलग-अलग व्यवहार करते हैं। प्राणी की स्थिति भ्रामक ऊर्जा के संरक्षण में होना या कृष्ण के व्यक्तिगत संरक्षण में होना है। जब कोई प्राणी पूरी तरह से समर्पित हो जाता है, तो वह कृष्ण के प्रत्यक्ष संरक्षण में होता है, और कृष्ण उसे वह सारी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह आत्मसाक्षात्कार में आगे बढ़ सकता है। हालाँकि एक गैर-भक्त, जो भ्रामक ऊर्जा की सुरक्षा के अधीन होता है, वह कृष्ण के साथ अपने संबंधों को भूलता ही जाता है। कभी-कभी यह पूछा जाता है कि कृष्ण कैसे किसी को भूलने पर मजबूर करते हैं। कृष्ण स्वयं अपने भक्तों को भौतिक गतिविधियों को भूलने पर मजबूर करते हैं, और माया के माध्यम से कृष्ण गैर-भक्तों को प्रभु की भक्ति सेवा को भूलने पर मजबूर करते हैं। इसे अपोहन कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)