भगवान कृष्ण ने भगवद गीता (15.15) में कहा है:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर् ज्ञानमपोहणं च
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्त-कृद्वेद-विदेव चा-हम्
"मैं हर किसी के हृदय में विराजमान हूं और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान, और विस्मृति आती है। सभी वेदों द्वारा केवल मुझे ही जाना जा सकता है। निश्चित ही, मैं वेदांत का संकलनकर्ता हूँ, और मैं ही वेदों का ज्ञाता हूं।" हर किसी के हृदय में विराजमान होकर कृष्ण प्राणी की स्थिति के अनुसार अलग-अलग व्यवहार करते हैं। प्राणी की स्थिति भ्रामक ऊर्जा के संरक्षण में होना या कृष्ण के व्यक्तिगत संरक्षण में होना है। जब कोई प्राणी पूरी तरह से समर्पित हो जाता है, तो वह कृष्ण के प्रत्यक्ष संरक्षण में होता है, और कृष्ण उसे वह सारी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह आत्मसाक्षात्कार में आगे बढ़ सकता है। हालाँकि एक गैर-भक्त, जो भ्रामक ऊर्जा की सुरक्षा के अधीन होता है, वह कृष्ण के साथ अपने संबंधों को भूलता ही जाता है। कभी-कभी यह पूछा जाता है कि कृष्ण कैसे किसी को भूलने पर मजबूर करते हैं। कृष्ण स्वयं अपने भक्तों को भौतिक गतिविधियों को भूलने पर मजबूर करते हैं, और माया के माध्यम से कृष्ण गैर-भक्तों को प्रभु की भक्ति सेवा को भूलने पर मजबूर करते हैं। इसे अपोहन कहा जाता है।
