श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 21: भगवान् श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तथा माधुर्य  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.21.44 
मधुरैश्वर्य - माधुर्य - कृपादि - भाण्डार ।
योगमाया दासी याहाँ रासादि लीला - सार ॥44॥
 
 
अनुवाद
"वृन्दावन कृष्ण की कृपा और दाम्पत्य प्रेम के मधुर ऐश्वर्य का भण्डार है। यहीं पर आध्यात्मिक ऊर्जा, एक दासी की तरह कार्य करते हुए, समस्त लीलाओं का सार, रास नृत्य प्रदर्शित करती है।"
 
Vrindavan is the repository of Krishna's grace and the sweet splendor of love. It is here that the spiritual power, as a servant, performs the Rasa dance, the essence of all pastimes.
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