श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 21: भगवान् श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तथा माधुर्य  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.21.144 
काणेर भितर वासा करे, आपने ताँहा सदा स्फुरे
अन्य शब्द ना देय प्रवेशिते ।
आन कथा ना शुने काण, आन बलिते बोलय आन
एइ कृष्णेर वंशीर चरिते ॥144॥
 
 
अनुवाद
"उनकी बांसुरी का कंपन उस पक्षी के समान है जो गोपियों के कानों में घोंसला बनाकर हमेशा वहीं विराजमान रहता है, किसी अन्य ध्वनि को अपने कानों में प्रवेश नहीं करने देता। वास्तव में, गोपियाँ न तो कुछ और सुन पाती हैं, न ही किसी अन्य चीज़ पर ध्यान केंद्रित कर पाती हैं, यहाँ तक कि कोई उपयुक्त उत्तर भी नहीं दे पातीं। भगवान कृष्ण की बांसुरी के कंपन के प्रभाव ऐसे ही होते हैं।"
 
"The sound of his flute is like a bird that builds its nest inside the ears of the gopis and remains there forever. It prevents any other sound from entering their ears. Indeed, the gopis are unable to hear anything else, concentrate on anything else, and respond appropriately. Such are the effects of the sound of Krishna's flute."
तात्पर्य
ग्वालिनियों के कानों में सदैव कृष्ण की बाँसुरी की मधुर ध्वनि गूँजती है। स्वाभाविक रूप से वे दूसरा कुछ सुन ही नहीं पाती हैं। कृष्ण की बाँसरी की पवित्र ध्वनि का निरंतर स्मरण उन्हें प्रबुद्ध और जीवंत बनाए रखता है। वे अपने कानों में किसी अन्य ध्वनि को प्रवेश नहीं करने देती हैं। चूँकि उनका ध्यान कृष्ण की बाँसुरी पर टिका रहता है, वे अपना मन किसी अन्य विषय पर नहीं लगा सकती हैं। दूसरे शब्दों में, जो भक्त कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि सुन चुका होता है, वह किसी अन्य विषय पर बात करना या सुनना भूल जाता है। कृष्ण की बाँसुरी की इस ध्वनि को हरे कृष्ण महामंत्र द्वारा निरूपित किया जाता है। भगवान का एक गंभीर भक्त, जो इस दिव्य ध्वनि का जप और श्रवण करता है, उसका इस मंत्र से इतना अभ्यास हो जाता है कि वह अपना ध्यान किसी ऐसे विषय पर नहीं लगा सकता है, जो कृष्ण के आनंदमय स्वरूप और उपकरणों से संबंधित न हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)