श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 21: भगवान् श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तथा माधुर्य  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.21.137 
सनातन, कृष्ण - माधुर्य - अमृतेर सिन्धु
मोर मन - सन्निपाति, सब पिते करे मति, ।
दुर्दैव - वैद्य ना देय एक बिन्दु ॥137॥
 
 
अनुवाद
"हे सनातन, कृष्ण के व्यक्तित्व की मधुरता अमृत सागर के समान है। यद्यपि मेरा मन अब आक्षेपजन्य रोगों से ग्रस्त है और मैं उस सम्पूर्ण सागर को पी जाना चाहता हूँ, किन्तु दमनकारी वैद्य मुझे एक बूँद भी पीने नहीं दे रहे हैं।
 
"O eternal one, Krishna's sweetness is like an ocean of nectar. Although my mind is currently afflicted with syncope and I long to drink the entire ocean, unfortunately the physician is not allowing me to drink even a drop of it."
तात्पर्य
जब कफ, पित्त और वायु यानी शरीर के तीन तत्त्वों का मेल होता है तो सन्निपात या एक प्रकार के आक्षेप से युक्त व्याधि हो जाती है। भगवान् चैतन्य ने कहा, "मेरा यह रोग भगवान् कृष्ण के साक्षात रूप-गुणों से उत्पन्न हुआ है। तीन तत्त्व कृष्ण के शरीर की सुंदरता, उनके मुख की सुंदरता और उनकी मुस्कान की सुंदरता हैं। इन तीनों सुंदरियों से आक्रांत होकर मेरा मन आक्षेप से युक्त हो जाता है। वह कृष्ण की सुंदरता के सागर को पीना चाहता है, किंतु क्योंकि मुझे आक्षेप हो रहा है, मेरे वैद्य जो स्वयं श्रीकृष्ण है, वे मुझे उस सागर से पानी की एक बूंद भी नहीं लेने देते।" श्री चैतन्य महाप्रभु इस प्रकार उन्मत हो जाते थे क्योंकि वे स्वयं को गोपियों के भाव से प्रकट कर रहे थे। गोपियाँ कृष्ण के साक्षात रूप-गुणों से उत्पन्न होने वाले माधुर्य के सागर को पीना चाहती थीं पर कृष्ण ने उन्हें अपने पास न आने दिया। परिणामस्वरूप कृष्ण से मिलने की उनकी आकांक्षा बढ़ती गई और कृष्ण के साक्षात रूप-गुणों से अमृत न पी पाने के कारण वे अत्यंत दुखी हो गई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)