तारुण्यामृत - पारावार, तरङ्ग - लावण्य - सार,
ताते से आवर्त भावोद्गम ।
वंशी - ध्वनि - चक्रवात, नारीर मन - तृण - पात,
ताहा डुबाय, ना हय उद्गम ॥113॥
अनुवाद
"श्रीकृष्ण का शारीरिक सौन्दर्य शाश्वत यौवन के सागर में लहर के समान है। उस महासमुद्र में परमानंद प्रेम के जागरण का भँवर है। कृष्ण की बांसुरी का स्पंदन बवंडर के समान है, और गोपियों के चंचल मन तिनकों और सूखे पत्तों के समान हैं। बवंडर में गिरने के बाद, वे फिर कभी नहीं उठतीं, बल्कि कृष्ण के चरणकमलों में सदैव रहती हैं।
"The beauty of Shri Krishna's body is like a wave in the ocean of eternal youth. The rising of love in that ocean is like a whirlpool. The sound of Krishna's flute is like a cyclone, and the restless minds of the gopis are like dry leaves and straws. When they fall into the cyclone, they never rise again, but remain forever at Krishna's lotus feet."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥