श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 21: भगवान् श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य तथा माधुर्य  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.21.111 
कहिते कृष्णेर रसे, श्लोक पड़े प्रेमावेशे ,
प्रेमे सनातन - हात ध रि’ ।
गोपी - भाग्य, कृष्ण गुण, ये करिल वर्णन ,
भावावेशे मथुरा - नागरी ॥111॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार मथुरा की स्त्रियाँ वृन्दावन की गोपियों के सौभाग्य और कृष्ण के दिव्य गुणों का भावविभोर होकर वर्णन कर रही थीं, उसी प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु भी कृष्ण के विभिन्न रसों का वर्णन करते हुए भावविभोर हो गए। सनातन गोस्वामी का हाथ पकड़कर उन्होंने निम्नलिखित श्लोक सुनाया।
 
Just as the women of Mathura passionately described the fortunes of the gopis of Vrindavan and the transcendental qualities of Krishna, Sri Chaitanya Mahaprabhu described the various rasas of Krishna and was overwhelmed with love. He took Sanatana Goswami's hand and recited the following verse.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)