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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 20: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान की शिक्षा  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.20.99 
“नीच जाति, नीच - सङ्गी, पतित अधम ।
कुविषय - कूपे पड़ि’ गोडाइनु जनमः ॥99॥
 
 
अनुवाद
सनातन गोस्वामी ने कहा, "मैं एक निम्न कुल में जन्मा हूँ, और मेरे सभी संगी-साथी निम्न वर्ग के लोग हैं। मैं स्वयं पतित हूँ और मनुष्यों में सबसे नीच हूँ। वास्तव में, मैंने अपना पूरा जीवन पापमय भौतिकवाद के कुएँ में गिरकर बिताया है।"
 
"I was born into a lowly family, and my companions are also lowly. I myself am fallen and lowly. Indeed, I have spent my entire life plunging into the pit of sinful materialism.
तात्पर्य
वास्तव में श्री सनातन गोस्वामी एक ब्राह्मण परिवार से थे क्योंकि वह ब्राह्मणों के सारस्वत प्रभाग के अंतर्गत आते थे और उनकी परवरिश और शिक्षा अच्छी तरह से हुई थी। किसी तरह वह मुस्लिम सरकार में एक मंत्री बन गये; इसलिए उन्हें मांस खानेवालों, शराबियों और स्थूल भौतिकवादियों के साथ संपर्क रखना पड़ा। सनातन गोस्वामी खुद को पतित मानते थे, क्योंकि ऐसे लोगों के संपर्क में आने से, वह भी भौतिक सुखों के शिकार हो गये। अपने जीवन को इस तरह व्यतीत करने के बाद, उन्होंने यह महसूस किया कि उन्होंने अपना मूल्यवान समय बरबाद कर दिया। इस भौतिक संसार में कैसे कोई पतित हो सकता है इसके बारे में यह कथन, गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदाय के सबसे बड़े अधिकारी द्वारा किया गया है। वास्तव में पूरा संसार वर्तमान में भौतिक अस्तित्व में पतित है। हर कोई मांस खानेवाला, शराबी, स्त्रीलंपट, जुआरी और न जाने क्या-क्या है। लोग चार मूल भौतिक पापों को करके भौतिक जीवन का आनंद उठा रहे हैं। यद्यपि वे पतित हैं, अगर वे खुद को सिर्फ श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों में समर्पित कर दें, तो वे पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाएँगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)